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नागरिकता संशोधन बिल पर आखिर क्यों बरपा है संसद में हंगामा 

रिपोर्ट -अंकित सिंह

ब्यूरो डेस्क। तीन तलाक,अनुच्छेद 370 के बाद केंद्र की सरकार ने विवादित बिल नागरिकता संशोधन बिल 2019 को लोक सभा में पेश किया। काफी गहमा गहमी के बाद आख़िरकार यह विधेयक लोक सभा से पारित कर दिया गया,जहां इस विधेयक के पक्ष में 311 सदस्यों ने मतदान किया, वहीं 80 सदस्यों ने इसके विरोध में वोटिंग की।अब राज्यसभा में इस बिल को भेज दिया गया है। यदि यह विधेयक राज्यसभा से पास होता है,तो अंतिम मुहर के लिए राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाएगा। सबसे पहले 2016 में ‘नागरिकता अधिनियम’ 1955 में बदलाव के लिए मोदी सरकार ने यह विधेयक लोकसभा में पेश की। इस बिल में सरकार ने अफगानिस्तान,बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिन्दुओं, सिखों,,जैन,पारसियों और ईसाईयों को बिना वैध दस्तावेज के भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव रखा गया। उनके निवास के समय सीमा में भी बदलाव किया गया, जो पहले 11 वर्ष थी वह 6 वर्ष किया गया।  उस समय इस बिल को लाने के पीछे भाजपा सरकार का यह प्रयास था कि अवैध प्रवासियों की परिभाषा को बदलना। बीजेपी की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद ने उस वक्त बिल का विरोध किया और सत्तासीन गठबंधन से अलग हो गई,लेकिन विधेयक निष्प्रभावी होने के बाद AGP पुनः भाजपा के साथ जुड़ गई।

क्या है अहम बातें नागरिकता संशोधन बिल 2019 में
नागरिकता संशोधन बिल 2019 सोमवार को निचले सदन में गृह मंत्री अमित शाह ने पेश किया और यह एक बड़े अंतर से सोमवार की आधी रात को पारित कर दिया गया । इस विधेयक के अनुसार कुछ विशेष समुदाय को नागरिकता देने का प्रस्ताव है।इस विधेयक में वैसे अल्पसंख्यक शामिल किए गए है, जो अफगानिस्तान,बांग्लादेश और पाकिस्तान में धार्मिक तौर पर निशाना बनाए गए है और इसके आशंका से अपना देश छोड़कर भारत आए है और यहां पर निवास कर रहे है। वैसे लोगों को यह साबित करना होगा कि वो 31 दिसंबर 2014 को या इसके पहले भारत आ गए थे । इस बिल में मुख्यतौर से हिन्दू, सिख, बौद्ध,जैन,पारसि और ईसाई शामिल है| इनको नागरिकता CAB संशोधन द्वारा दी जाएगी। इस बिल के विरोध में जो आवाज उठ रही है। वह उसमे मुस्लिमों को नागरिकता देने का जिक्र नहीं है।

क्यों जरुरत पड़ी नागरिकता संशोधन बिल लाने की
देश के गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने इस विधेयक के लाने के पीछे उन्होंने नेहरु -लियाकत समझौते का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ‘1950 में इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया। यदि धर्म के आधार पर देश का विभाजन नहीं किया गया होता तो इस विधेयक की जरुरत ही नहीं पड़ी होती है।उन्होंने आगे कहा कि जहां भारत में आजादी के समय मुस्लिमों की आबादी देश के आबादी का 9.8% था वहीं अब 14.23% हो गए है। जबकि पाकिस्तान में 1947 में अल्पसंख्यक 23 प्रतिशत थे जो अब 2011 में 3.7% बांग्लादेश में 22 प्रतिशत से घटकर 2011 में 7.8 प्रतिशत हो गए है । साथ ही एक सवाल यही भी उठता है कि सरकार लामा शरणार्थियों के बारे में भी सोचे और यह भी आज के परिवेश के अनुसार अहम मुद्दा है।

राजनीति गलियारों से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों तक विरोध क्यों ?
इस विधेयक के विरोध में विपक्ष ने इस बात का हवाला दे रही है कि यह विधेयक मुसलमानों के ख़िलाफ़ है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद -14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। भारत की पहचान पूरे विश्व में एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में होती है।धर्म के आधार पर इस तरह का भेद भाव सही नहीं है । लोक सभा में गृह मंत्री विधेयक पेश कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि यह बिल किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। हम एक सकारात्मक भाव के साथ यह बिल लोक सभा में लेकर आए हैं| यह उन लोगों के लिए है,जो इन देशों से प्रताड़ित किये गए हैं ,ये प्रताड़ित शरणार्थी हैं ये कोई घुसपैठी नहीं है। हम अनुच्छेद 14,21,25 का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं।इस बिल के विरोध में कांग्रेस,राजद,सपा,बसपा,टीएमसी के साथ कुछ और पार्टियों ने विरोध किया, लेकिन सबसे बड़ राजनीति गलियारों हलचल उस समय देखने को मिला जब कांग्रेस के साथ शिव सेना महाराष्ट्र में सरकार चला रही है। उसके बावजूद अपने हिन्दू विचारधारा के साथ उसने कोई समझौता नहीं किया और बिल का समर्थन किया। इस बिल को लेकर सबसे अधिक पूर्वोत्तर राज्यों में विरोध देखने को मिल रहा है,जिसमें असम,मेघालय,मणिपुर,मिजोरम,त्रिपुरा,नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भी विधेयक का विरोध हो रहा है। वजह यह है कि ये राज्य बांग्लादेश की सिमा के बेहद क़रीब है। इन राज्यों में बड़ी मात्रा में हिन्दू और मुसलमान आकर बसे है।

एनआरसी और CAB को लेकर यह भी है विवाद
नागरिकता संशोधन बिल 2019 अगर पारित हो जाता है तो नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) भी प्रभावहीन हो जाएगा। दरसल एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल एक दूसरे के विरोधाभासी है। CAB में सरकार ने धर्म के आधार पर शरणार्थियों को नागरिकता देना चाहती है तो वहीं एनआरसी धर्म के आधार पर शरणार्थियों को लेकर भेदभाव नहीं है। इसके अनुसार,24 मार्च 1971 के बाद अवैध रूप में देश से घुसे प्रवासियों को निर्वासित किया जाना था। असम में बांग्लादेश होने वाले घुसपैठ को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी अपडेट करने को कहा था।असम पहला राज्य था जो 1951 के बाद एनआरसी अपडेट किया गया।

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