राजनीति की सौतन है प्याज

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रिपोर्ट-अंकित सिंह

ब्यूरो रिपोर्ट। प्याज का दाम जब-जब भी बढ़ा, राजनीति की गलियारों में बेचैनी बढ़ा दिया। विशेष रुप से सत्ता पर काबिज पार्टी के लिए तो यह किसी सौतन से कम नहीं है| सब्जियों के लम्बी लिस्ट में प्याज ही एक ऐसी सब्जी है, जो समय -समय पर सरकार की सौतन तो विपक्ष की सहेली बनती रहती है। प्याज के दाम बढ़ने से जो हाय तौबा मचा है| यह पहली बार नहीं बल्कि कई दशकों से प्याज समय-समय पर अपने ताकत को बताता रहा है कि वह सरकार गिराने का मादा रखता है। प्याज का दाम जब -जब बढ़ा, बड़े -बड़े राजनीतिज्ञों को रुला दिया ।भले इसके पीछे मौसम की बेरुखी रही हो।

कब-कब प्याज बना सरकार गिराने का माध्यम
अगर यह कहा जाए कि प्याज राजनितिक रूप से संवेदनशील है, तो गलत नहीं होगा। भारत की राजनीत में आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी, उस समय कांग्रेस के पास कोई मुद्दा नहीं था कि वह सरकार के खिलाफ संसद में या देश की जनता के बीच जाकर बोल सके। उस समय यहीं प्याज जो अभी 120 से 150 रुपए किलो बिक रहा है| उस दौर में कांग्रेस के लिए सहेली बनी| यह और बात है कि आपसी तालमेल न होने के कारण जनता पार्टी की सरकार अल्प समय में ही सत्ता से बाहर हो गई। उसके बाद इन्दिरा गांधी की सरकार आयी,उनके जीत में प्याज का महंगा होना भी एक वजह था| इसके दाम की लगाम को कांग्रेस भी काबू करने में सफल नहीं हुई। उस समय विपक्ष में बैठे नेताओ ने कांग्रेस सरकार के विरोध में अनोखा प्रदर्शन किया। सुनने में आता है कि उस समय लोकदल नेता रामेश्वरम सिंह प्याज की हार पहनकर राज्य सभा में गए तो तत्कालिक सभापति एम हिदायतुल्ला ने उन्हें खरी-खोटी सुना दी।

अटल सरकार के लिए भी प्याज बना था समस्या
डेढ़ दशक के बाद केंद्र में एनडीए की सरकार थी, जिसकी अगुवानी अटल विहारी वाजपेयी कर रहे थे और देश के प्रधानमंत्री बने। समय था 1998 प्याज सब्जियों की मेल से बाहर निकला और अटल सरकार के लिए समस्या बनना शुरू किया। दिल्ली में बीजेपी की सरकार थी और सिर पर विधानसभा चुनाव। सरकार ने कई तरह की कोशिशें भी की,लेकिन सरकार की सौतन प्याज को सस्ते दर से बेचने की सभी कोशिशे नाकाम साबित हुईं। मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बुरी तरह हार गई। उस वक्त अटल विहारी वाजपेयी ने कहां भी था कि ‘जब कांग्रेस सत्ता में नहीं रहती है तो प्याज परेशान करने लगता है’।

शिला सरकार में भी प्याज के दाम में आया था उछाल
2013 में एक बार फिर प्याज की कीमत बढ़ी और सरकार दिल्ली में कांग्रेस की थी। उस समय सुषमा स्वराज ने कहां था कि ‘शिला सरकार की शुरुआत हो चुकी है। 2014 में शिला दीक्षित सत्ता से बाहर हो गयी। भले ही दिल्ली की जनता नेमहंगाई और भ्रष्टाचार के कारण उन्हें पुनः सत्ता पर काबिज नहीं होने दिया। अभी भी माहौल कुछ ऐसा ही है। झारखंड में विधानसभा का चुनाव चल रहा है। अब देखना होगा कि क्या यह प्याज के दाम यहां भी अपना असर डालती है ।

क्या है वजह प्याज के दाम दाम बढ़ने के
देश में अभी प्याजा के दाम आसमान की छू रहे है। लोग अपने घरों में सोच समझकर प्याज का प्रयोग कर रहे हैं। अभी मार्केट में प्याज 120 से 150 रुपए के बीच बेचा जा रहा है। चीन के बाद भारत विश्व में प्याज का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में काफी बारिश और बाढ़ से प्याज के फसल 50 फीसदी से ज्यादा बर्बाद हो गए। पिछले साल कर्नाटक में 30 लाख प्याज का उत्पादन हुआ था जो इस साल घटकर लगभग 20 लाख तन के आस पास रह गया है। वहीं महाराष्ट्र में करीब 12 लाख टन के आसपास उत्पादन था जो इस वर्ष साढ़े चार लाख के आस पास रहने की उम्मीद है। तमिलनाडु,मध्यप्रदेश में भी हालत कुछ ठीक नहीं है।राजस्थान में इस वर्ष प्याज के उत्पादन में वृद्धि हुई है। सरकार ने प्याज की कीमतों को बढ़ने से रोकने लिए 2014 में मूल्य स्थिरीकरण फंड(पीएसएफ ) बनाया गया लेकिन इसका असर देखने को नही मिल रहा है। अब देखना होगा कि यह प्याज कब तक किचन में अपनी उपस्थिति थोड़े थोड़े रूप में दर्ज कराती रहती है और कब तक सरकार के घर में यह प्याज सौतन बनकर रहती है।