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क्या है श्राद्ध और इसका महत्व, जानिए  

वाराणसी। कहते हैं कि जब पुरखों की आत्माओं का आशीष इंसान को जिंदगी में मिलता रहता है तो उसके जीवन में खुशियां ही खुशियां बनी रहती हैं और माना जाता है कि आकाश से हमारी पुरखे व धरती पर हमारे बुजुर्ग अपनी दुआओं से हमारे जिंदगी में रौशनी बिखेरते रहते हैं। यहीं कारण है कि पितरों के श्राद्ध के लिए विधिविधान पूर्वक तर्पण आदि करना सभी के लिए आवश्यक होता है जिससे जीवन सुखमय बना रहे।

धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी वैसे तो मोक्ष  की नगरी के नाम से जानी जाती है। ऐसा  माना जाता है कि यहां प्राण त्यागने वाले हर इन्सान को भगवान शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं , मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण त्यागते हैं उनके मोक्ष  की कामना से काशी के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। देश भर में सिर्फ काशी के ही अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर यह त्रिपिंडी श्राद्ध होता है जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। इसीलिये पितृ पक्ष में तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है।

कब से कब तक है पितृ पक्ष
पंडा मुन्ना बताते हैं कि आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि तक पितृ पक्ष कहलाता है जो इस बार 13 सितम्बर से 28 सितम्बर तक पड़ रहा है जिसमें श्राद्ध संबंधी सभी कृत्य किये जाएंगे लेकिन जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि के दिन हुई हो उनका भाद्रपद माह के पूर्णिमा तिथि के दिन ही श्राद्ध करने का नियम है।पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध प्रौष्ठपदी श्राद्ध के नाम से जाना जाता है और इस बार यह श्राद्ध 13 सितम्बर को किया जाएगा। मान्यतायें ऐसी है कि पिशाचमोचन पर श्राद्ध कार्य करवाने से अकाल मृत्यु में मरने वाले पितरो को प्रेत बाधा से मुक्ति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस धार्मिक स्थल का उद्भव गंगा के धरती पर आने से पूर्व हुआ है। इस पिशाच मोचन तीर्थ स्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी वर्णित है।

कैसे करते हैं श्राद्ध
कर्मकांडी ब्राम्हणों के आचार्यत्व में पितरों को जौ के आटे की गोलियां, काला तिल, कुश और गंगाजल आदि से विधििवधान पूर्वक पिण्ड दान, श्राद्धकर्म व तर्पण किया जाता है। मान्यता अनुसार परिवार के मुख्य सदस्य  क्षोरकर्म (सिर के बाल, दाढ़ी व मूंछ आदि मुंडवाना) मंत्रोच्चार की ध्वनि के साथ पितरों का श्राद्धकर्म करते है। श्राद्धकर्म के पश्चात गौ, कौओं और श्वानों को आहार दिया जाता है। पिशाच मोचन में पिण्डदान की सदियों पुरानी परम्परा रही है। इसी के निमित्त आस्थावानों द्वारा हर वर्ष यहाँ कुण्ड पर पिण्डदान व श्राद्धकर्म कर गया में श्राद्धकर्म का संकल्प लिया जाता है।

13 सितंबर से लेकर 28 सितंबर का चलने वालापितृ पक्ष आज से प्रारंभ हो गया है। इसे श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। श्रद्धापूर्वक किये कार्य को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है। जीवित पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने की क्रिया श्राद्ध कहलाती है।

मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं इस बात के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि अवश्य होता है। संसार एक  या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से संबंध है।  इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध का लाभ हमारे पितरों को मिलता है।  जिससे वो प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते हैं।

श्राद्ध को केवल ये सोचकर पूरा नहीं किया जाना चाहिए कि सदियों से चली आ रही ये परम्परा है , बल्कि पितरों के द्वारा जो हमारे ऊपर उपकार हुए हैं, उनका स्मरण करके, उनके प्रति अपनी श्रद्धा और कृतघ्नता की भावना के साथ होना चाहिए ।

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