धर्म / ज्योतिष

वट सावित्री व्रत आज, जाने क्या है मान्यता और पूजा विधि

ब्यूरो रिपोर्ट। भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में विशेष कामना की पूर्ति के लिए व्रत उपवास रखकर पूजा अर्चना करने की प्राचीन परंपरा है। अखंड सौभाग्य की कामना के साथ वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ  कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होकर के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक किया जाता है। यह व्रत सुहागिन महिला अपने पति की दीर्घायु एवं अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए रखती हैं। व्रत के दिन वट वृक्ष तथा सत्यवान सावित्री एवं यमराज की पूजा की जाती है ऐसी मान्यता है कि वट वृक्ष के मूल में ब्रह्मा,मध्य में विष्णु तथा ऊपर वाले भाग में शिव का वास होता है जिसके फलस्वरूप वट वृक्ष की पूजा की जाती है।

ज्योतिषविद विमल जैन ने बताया कि इस दिन की विशेष मान्यता है क्योंकि इस दिन सावित्री अपने मृत पति के प्राण को यमराज से छीनकर वापस लायीं थी। यह सौभाग्यवती स्त्रियों का प्रमुख पर्व है। इस व्रत को करने का विधान त्रयोदशी से पूर्णिमा अथवा अमावस्या तक है। यह व्रत रखने वाली स्त्रियों का सुहाग अचल रहता है। इस व्रत में प्रातः काल स्नान के बाद बांस की टोकरी में सप्त धान भरकर ब्रह्मा जी की मूर्ति स्थापित करके, दूसरी टोकरी में सत्यवान व सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करके वट वृक्ष के नीचे रखकर पूजा करनी चाहिए तदोपरान्त बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए।

जल,मौली,रोली,कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, गुड़, फूल, तथा धूप-दीप से वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींच कर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। भीगे हुए चनों का वायना निकालकर, उस पर रुपये रखकर सास के चरण स्पर्श कर देना चाहिए। वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिंदूर तथा कुमकुम से सुवासिनी स्त्री के पूजन का विधान है।

व्रत के बाद फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करनी चाहिए। यह व्रत स्त्रियों द्वारा अखण्ड सौभाग्यवती रहने की कामना से किया जाता है। इस व्रत में प्रायः सामूहिक पूजा का विधान भी है।

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