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उफ्फ, सुन लेंगे इनकी बात…तो आंखों से उमड़ पड़ेंगे जज्बात

वाराणसी। ऐ राहें मुझे यूं न थका। कीमत क्या लेगी मंजिल की तू यह तो बता। पावं के छाले ही पूंजी है मेरी। जान लेना है मेरी तो वह भी बता। यह चार लाइनें उन मेहनतकश मजदूरों के अनबोले अल्फाज़ हैं जो मजबूरीवश इस लॉक डाऊन में निकल पड़े हैं इस उम्मीद से की अपने गांव-मोहल्ले पहुंचकर जी भर कर अपनो को पकड़ कर रोयेंगे। रात को अपनी माटी में बेफिक्र होकर सोएंगे।

शाम का 5 बजे का वक्त स्थान शहर का अंधरापुल। थकान से चूर दो मासूम बच्चों पत्नी भाई के साथ वह पण्डित दीनदयाल हॉस्पिटल का पता पूछ रहा है। पीठ पर भारी भरकम बैग उसके तकलीफ में और इजाफा कर रहें हैं। पूछने पर वह बताता है कि उसका नाम जितेंद्र है,साथ में भाई पत्नी रीमा और दो पांच और दो साल की बच्चीयों और भाई शैलेंद्र के साथ प्रयागराज (इलाहाबाद) से पैदल ही निकल गया है। वह पिछले एक साल से वहां रहकर घरों में पेंटिंग का कार्य करता रहा है। लॉक डाऊन में काम बंद हो गया तो वह बचाये गये पैसों से अब तक खर्च चला रहा था। जब पैसा और धैर्य दोनों खत्म हो चला तो चल पड़ा गांव की ओर पत्नी बच्चों भाई के साथ। जितेंद्र बताते हैं दो दिन से पैदल चल रहा हूं,रास्ते में कोई ट्रक वगैरह मिल गया तो ठीक वरना पैदल ही चलता रहा। रास्ते में कुछ लोग सहयोग भी किये कुछ दे दिये नहीं तो वैसे ही चलता रहा हूं। बच्चे थक जाते तो कुछ देर सुस्ता के फिर आगे बढ़ जाता हूं। पांडेपुर स्थित दीनदयाल हॉस्पिटल में चेकअप कराकर उसे गांव जाना है, गाजीपुर के सादात। पूछने पर की वहां से कैसे जाओगे तो मायूस होकर कहते हैं की जैसे अब तक आया हूं।

यही हाल चौकाघाट गाटर पुल के पास मिले गोलू कुमार और सन्तोष ने बताया । गोलू सन्तोष सहित बीस लोग राजस्थान में पेंटिंग का काम करते थे। लॉक डाऊन लागू हुआ तो वहीं रूम पर दुबके हुए थें। जब तक पैसा था खर्च चलाया फिर किसी तरह राजस्थान से लखनऊ पहुंचे। फिर वहां से ट्रक वगैरह पर लिफ्ट के साथ पैदल चलते हुए बनारस पहुंचे थें। उनका घर बिहार के भभुआ हैं। जहां पहुंचने के लिए कदम बढ़ा रहे हैं। जब उनसे पूछा कि ट्रेन चल रही है तो पैदल क्यों चले तो पलट कर वही सवाल दाग देते हैं कि किधर ट्रेन चल रही है सर। भोजन के बारे में पूछने पर कहते हैं कि कई जगह लोग भोजन के पैकेट दे रहें थें।

शिवपुर के फ्लाईओवर के पास राजबली यादव, अनिल कुमार मिलें वहां दोनों ट्रक से लिफ्ट के चक्कर में खड़े थे। पूछने पर बताते हैं की वह वेस्ट बंगाल के वर्धमान में एक सरिया बनाने वाली फैक्ट्री में मजदूरी करते थे। हाल ही में वहां काम करने गए थें। लॉक डाऊन के पहले मिली पगार से काम बंद होने के बाद खर्च चला रहे थें। पैसा खत्म हुआ तो खाने के लाले पड़ गयें। तब दोनों वहां से साईकिल चलाकर लगभग 100 किलोमीटर आसनसोल तक आयेँ वहां इनकी साईकिल रख ली गयी और बस द्वारा इन्हें चन्दौली बनारस सीमा पर छोड़ दिया गया। उन्होंने बताया कि वह बनारस के सम्पूर्णानन्द यूनिवर्सिटी गये थे । वहां व्यवस्था में थोड़ी समस्या देखकर पैदल ही निकल गया। उनका कहना है कि उन्हें अयोध्या के बीकापुर जाना है। और इतना बताकर वह सड़क की तरफ मुहं करके वाहन का इंतजार करने लगते हैं।

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