BIRTHDAY SPECIAL: टाटा समूह को बुलंदियों तक पहुंचाने में है इनका योगदान

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ब्यूरो डेस्क। ‘पेड़ काटने के पूर्व कुल्हाड़ी की धार देखने की आवश्यकता होती है, इसलिए जब आठ घंटे में पेड़ काटना हो तो छः घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाने पर सफलता प्राप्त होने के अवसर बढ़ जाते हैं।’ ये कथन है भारत के सफल उद्योगपतियों, निवेशकों में शुमार रतन टाटा का।

पद्म भूषण, पद्म विभूषण से सम्मानित रतन टाटा ने टाटा ग्रुप की सभी कंपनियों जैसे टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर,टाटा टी, टाटा केमिकल्स, इडिंयन होटल्स, टाटा टेलीसर्विसेज को नयी उचॉंइयों तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया। ये भारत के टाटा समूह ग्रुप के अध्यक्ष पद पर भी रहें हैं। इन्होंने भारत के राष्ट्रीय रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक कंपनी लिमिटेड नेल्को के डायरेक्टर चार्ज के रूप में भी कार्य किया है। रतन टाटा 2012 में टाटा समूह के अध्यक्ष पद की सेवा से मुक्त हुए।

28 दिसम्बर 1937 को सूरत,गुजरात में रतन टाटा का जन्म हुआ था। ये टाटा ग्रुप के फाउंडर जमशेदजी टाटा के पोते हैं। जब ये दस वर्ष के थे तब इनके माता-पिता का तलाक हो गया था। इन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई ​कैथेड्रल एण्ड जॉन केनन स्कूल मुम्बई और बिशप कॉटन स्कूल शिमला से की। इसके बाद 1975 में इन्होंने हार्वर्ड से बिजनेस में एडवांस्ड मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की।

1961 में रतन ने पहली बार टाटा स्टील के शापॅ फ्लोर पर नौकरी की। इसके बाद 1974 में इन्हें मैनेजमेंट में कार्य करने को मिला। 1971 में टाटा की टीवी और रेडियो बनाने वाली कंपनी और घाटे में चल रही नेल्को कंपनी की जिम्मेदारी इन्हें सौंपी गयी। टाटा ने अपने मेहनत से नेल्को के शेयर को 2 प्रतिशत से 20 प्रतिशत पर लाकर खड़ा कर दिया, लेकिन देश में इमरजेंसी और आर्थिक मंदी के कारण यह कंपनी बंद हो गयी। 1981 में रतन टाटा को टाटा इंडस्ट्रीज का अध्यक्ष बनाया गया। इन्हें 1991 में टाटा समूह का चेयरमैन पद सौंपा गया। इसके बाद इन्होंने अपने मेहनत के दम पर टाटा के समूह को एक अलग मुकाम तक लाकर खड़ा किया।