आपातकाल के दौरान इस कवि की कविता जनमानस की थी आवाज

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 रिपोर्ट-अंकित सिंह

ब्यूरों डेस्क। 70 के दशक में जब देश में क्रांति की तरंगे उठ रही थी। उस वक्त जो नारें लोगों के जबान पर थे।वे एक ऐसे कवि की कविता और ग़ज़ल का मिश्रित पंक्तियों की रचना थी, जो उस दौर में आम जनमानस की आवाज बन रही थी। वह स्वयं कहते थे। मैं ना तो हिंदी में कहता हूँ ना ही उर्दू में, बात कहता हूँ हिंदुस्तानी में। हम बात कर रहे है आधुनिक युग के महाकवि दुष्यंत कुमार की।

1974 में जब जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया तो उस समय दुष्यंत की लिखी हुई ये पंक्तियां युवाओं के जुबान पर थी-

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार पर्दो की तरह हिलने लगी।
शर्त है लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
मेरे सीने में नही तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी,आग,लेकिन आग जलनी चाहिए।

यह दुष्यंत थे जिनकी लिखी हुई कविता और ग़ज़ल उस दौर में सरकार से नाराज जनता के शब्द बन रहे थे। यह पहली बार ही था शायद हिंदी साहित्य के इतिहास में जिनकी कविता आम लोगों की जुबान में बात कर रहा था। उस दौर में हिंदी कि कविताओं में कठिन शब्दों का प्रयोग हो रहा था। वह समय था अज्ञेय और गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं का बोल था। गजल में प्रेम की बातें हुआ करती थी। उस समय इन्होंने हिंदुस्तान के साहित्य में पहली बार क्रांति से जुड़ी गजल। 1974 में राजनितिक से मोह भंग करने पर लिखा-

कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए।
कहां चिराग मयस्सर नही शहर के लिए।
यहां दरखतों के सायें में धूप लगती है।
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।

उनकी लिखी हुई कविता सीधे तौर पर सरकार और उनके कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते थे,क्योंकि इनकी गजल और कविता समसामयिकी पर लिखी होती थी। यह बात कहां भी जाता है कि सरकार अक्सर सरकार विरोधी आवाज को सहन नहीं करती। कुछ इनके साथ भी ऐसा ही हुआ| उस समय इंदिरा गांधी के कार्यप्रणाली को लेकर आम जनमानस काफी असंतुष्ट था। इन्होंने इंदिरा गांधी पर इशारा करते हुए लिखा कि-

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर ये तमाशा देखकर हैरान है
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहे
इस अंधेरी कोठरी में एक रौशनदान है।
यह ग़ज़ल 1975 में लिखी गई थी। इस समय दुष्यंत मध्य प्रदेश के भाषा विभाग भोपाल में सहायक संचालक के पद पर कार्य कर रहे थे।

दुष्यंत कुमार का जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश ) के ग्राम राजपुर नवादा में 1 सितंबर, 1933 को गुलाम भारत में हुआ। उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था। इस महाकवि की रचना आजाद भारत में जेपी आंदोलन के समय युवाओं और नेताओ के भाषण में सुनाई पड़ते थे। शुरुआती शिक्षा गाँव की पाठशाला से हुई हाईस्कूल नहटौर और इंटरमीडिएट चंदौसी से हुई। दसवीं में जब यह पढ़ रहे थे। उस समय ही कविता लिखना शुरु कर दिए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी.ए.और एम.ए.की पढ़ाई पूरी किए। इनका विवाह राजेश्वरी त्यागी से हुआ। कुछ समय ये आकाशवाणी,भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे और आगे मध्य प्रदेश के भाषा विभाग भोपाल में सहायक संचालक के पद पर भी कार्यरत रहे।

महाकवि की कविता 20वीं सदी में नाराज़गी,अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी। इसके चलते उन्हें एकबार मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद ने बुलाया घटना कुछ ऐसा था कि बस्तर के महाराज भंजदेव की पुलिस फायरिंग में मौत गई थी। ये आदिवासी कल्याण के लिए कार्य करते थे। इस पर दुष्यंत कुमार ने कविता सरकार के कार्यप्रणाली पर कटाक्ष करते हुए लिखा, जिसके चलते उन्हें सूबे के मुखिया ने तलब किया था।

दुष्यंत कुमार खुद कहते थे कि मै अपनी ग़ज़ल और कविता में वही लिखता हूँ जिसे मै जीता हूँ ।
1975 उनके द्वारा एक कविता लिखी गई जो गरीबो को एक खबर सुना रही थी और सरकार को उसके कार्यों की असफलता को बता रही थी…
भूख है तो सब्र रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दा।
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं
पेट भरकर गलियां दो, आह भरकर बद्दुआ।
इस महाकवि को अपने दोस्तों से बड़ा लगाव था। दफ़्तर से आने बाद वह अपने दोस्तों के साथ बैठते और अपनी ग़ज़ल कविताओं को सुनाते थे। ये अपनी कोई भी लिखी कविता,ग़ज़ल सबसे पहले अपनी पत्नी को सुनाते थे। महाकवि ने अपने अल्प आयु में कुछ ऐसा लिखे, जो आज भी कहीं न कहीं सुनाई पड़ती है। क्रांति के रुप में या प्रेमी की आवाज में-

मै जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

आपातकाल के समय दुष्यंत की कविता आवाज थी देश के लोगो की। उसके राजनीति में सत्ता का उथल पुथल देख वह दुखित थे। शायद उनकी मौत का कारण भी यही होगा। तभी तो मात्र 42 वर्ष की उम्र में 30 दिसम्बर 1975 को दुनिया छोड़कर चले गए।