आज ही के दिन दुनिया से अलविदा हुए थे इसरो के संस्थापक

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ब्यूरो डेस्क। भारतीय इतिहास के महान वैज्ञानिकों में से एक थे, विक्रम अम्बालाल साराभाई जिनके किये गए कार्य से आज पूरा देश गौरवान्वित होता हैं। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों का जनक विक्रम साराभाई को माना जाता है। इन्हीं ​के मार्गदर्शन में भारत का अं​तरिक्ष कार्यक्रम कामयाबी की ओर बढ़ा। यह भारतीय वैज्ञानिक होने के साथ ही एक खोजकर्ता भी थे। इन्हें इनके कार्यों के लिए 1966 को पद्म भुषण तो वहीं 1972 में पद्म विभूषण दिया गया। इसी के साथ 1962 को इन्हें शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार भी मिला।

इनका जन्म 12 अगस्त 1919 में गुजरात के अहमदाबाद शहर में हुआ। इनकी माता का नाम सरला देवी और पिता का नाम अम्बालाल साराभाई था। यह एक सम्पन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता सफल उद्योगपती थे। यह अपने माता पिता के आठ संतानों में सबसे छोटे थे। इनका परिवार भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल था।​ जिस कारण हमेशा जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू जैसे कई स्वतंत्रता सेनानी उनके घर हमेशा आते थे। इन सब ने साराभाई के निजी ​जीवन पर काफी प्रभाव डाला।

इन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद अपने मैट्रिक की पढ़ाई अहमदाबाद के गुजरात के महाविद्यालय से की। इसके बाद की शिक्षा इंग्लैड के​ कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के सेन्ट जॉन महाविद्यालय से की। 1940 में इनको प्राकृतिक विज्ञान में सराहनीय कार्य के​ लिए ट्रिपोस भी मिला। द्वितीय विश्वयुद्ध के वजह से यह भारत लौट आए और यहां के भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में, नोबेल पुरस्कार विजेता सर.सी.व्ही.रमन के सानिध्य में अंतरिक्ष किरणों की खोज शुरू कर ​दी।

इनका विवाह क्लासिकल की मशहुर नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई के साथ सितंबर 1942 को चेन्नई में ​हुआ। जि​समें इनका परिवार मौजूद नहीं था,क्योकि उस समय इनका परिवार भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल था। इनके दो बच्चे मल्लिका साराभाई और कार्तिकेय साराभाई हुए। 

इन्होंने यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल), दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफ़ार्मिंग आर्ट्स अहमदाबाद, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आईआईएम) अहमदाबाद, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र तिरुवनंतपुरम, कम्यूनिटी साइंस सेंटर अहमदाबाद जैसे कई संस्थानों की स्थापना की। 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना, इनके महान उपलब्धियों में से एक है। 30 दिसंबर 1971 को में केरला के तिरुवनंतपुरम के कोवलम में    इनकी मृत्यु हुई थी। भले ही ये आज हमारे बीच नहीं है लेकिन इनके किये गए कार्य से आज पूरा देश गौरवान्वित होता है।