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Reliance जियो ने निवेश करवाने के मामले में लगाया हैट्रिक, इस डील के बाद टेलीकॉम इंडस्ट्री में जमा ली अपनी धाक

नई दिल्‍ली। रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड और जियो प्‍लेटफॉर्म लिमिटेड ने शुक्रवार को घोषणा करते हुए बताया है कि अमेरिका की विस्‍टा इक्विटी पार्टनर्स जियो प्‍लेटफॉर्म में 11,367 करोड़ रुपए का निवेश करेगी। इस निवेश के साथ जियो प्‍लेटफॉर्म का इक्विटी मूल्‍य 4.91 लाख करोड़ रुपए हो गया है और इसकी एंटरप्राइज वैल्‍यू भी बढ़कर 5.16 लाख करोड़ रुपए हो गई है। फेसबुक और सिल्वर लेक के जियो में निवेश के बाद यह आरईएल ( RIL )में पिछले दो सप्ताह में तीसरी बड़ी डील है।   

बता दें कि विस्‍टा इनवेस्‍टमेंट जियो प्‍लेटफॉर्म में फुली डायल्‍यूटेड आधार पर 2.32 प्रतिशत हिस्‍सेदारी खरीदेगी। इस निवेश के साथ विस्‍टा जियो प्‍लेटफॉर्म में रिलायंस इंडस्‍ट्रीज और फेसबुक के बाद सबसे बड़ा निवेशक बन गया है। रिलायंस जियो में तीसरा हाई प्रोफाइल निवेश है। फेसबुक ने जियो में 9.9 प्रतिशत हिस्सेदारी 43,534 करोड़ रुपये में और सिल्वर लेक ने 1.55% हिस्सेदारी के लिए 5655 करोड़ का निवेश किया। इस हफ्ते की शुरुआत में जियो में सिल्वर लेक द्वारा किया गया निवेश भी फेसबुक सौदे के समान प्रीमियम पर था। तीन हफ्ते के अंदर जियो प्लेटफॉर्म्स ने टेक्नोलॉजी इन्वेस्टर्स से 60,596.37 करोड़ रुपये जुटाए हैं।

हालांकि भारत में विस्टा का यह पहला बड़ा निवेश है। विस्टा का शुरुआती चरण में तकनीकी कंपनियों में निवेश करने का एक ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। इसका प्रत्येक निवेश 10 वर्षों में प्रॉफिटेबल रहा है। विस्टा का निवेश अगली पीढ़ी के सॉफ्टवेयर और प्लेटफॉर्म कंपनी के रूप में जियो को प्रदर्शित करता है। यह जियो की तकनीकी क्षमताओं का समर्थन भी है और इस कोविड-19 की इस दुनिया में और उससे आगे भी बिजनेस मॉडल की क्षमता है।

विस्टा के चेयरमैन और सीईओ रॉबर्ट एफ स्मिथ ने कहा कि जियो भारत के लिए निर्माण कर रहा है। उन्होंने कहा कि हम भारत भर में कनेक्टिविटी में वृद्धि प्रदान करने के लिए जियो प्लेटफार्मों के साथ जुड़ने के लिए काफी उत्साहित है।साथ ही कहा कि भारत में आधुनिक तकनीक के जरिये उपभोक्ता आधुनिक हो रहे हैं। उन्हें बेहतर सॉफ्टवेयर की जरूरत है। यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। जियो की लॉन्चिंग के बाद रिलायंस देश की एकमात्र ऐसी कंपनी के रूप में उभरी है, जो तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार में अमेरिकी तकनीकी समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है।

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