आज ही के दिन हुआ था संसद पर हमला, सुरक्षा में लगी थी सेंध

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रिपोर्ट-सौम्या चौरसिया

ब्यूरो रिपोर्ट। संसद भवन पर आतंकवादी हमले को आज 18 साल हो गए हैं लेकिन उस हमले के जख्म आज भी लोगों के दिलों-दिमाग में ताजा हैं। 13 दिसंबर 2001 की तारीख भारतीय लोकतंत्र को थर्रा दी थी। दहशत के वो 45 मिनट कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पूरा देश भौचक था कि आखिर संसद पर हमला कैसे हो सकता है। सुबह 11 बजकर 20 मिनट का समय हो ही रहा था कि तभी गोलियों की आवाज, हाथों में एके-47 लेकर संसद परिसर में दौड़ते आतंकी, बदहवास सुरक्षाकर्मी, इधर से उधर भागते लोग दिखाई दे रहे थे,जो हो रहा था वो उस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था क्यूंकि संसद की सुरक्षा में बहुत बड़ी सेंध लग चुकी थी।

बता दें कि उस दिन संसद में ताबूत घोटाले पर कोहराम मचा हुआ था, जिसके बाद सदन को स्थगित कर दिया गया था। जिसके बाद तमाम सांसद संसद भवन से बाहर निकल गए। कुछ ऐसे थे जो सेंट्रल हॉल में बातचीत में मशगूल हो गएऔर  कुछ लाइब्रेरी की तरफ बढ़ गए। तभी लाल बत्ती में एक सफेद रंग की एंबैसेडर कार संसद मार्ग पर तेजी के साथ दौड़ती हुई  विजय चौक से बाएं घूमकर संसद की तरफ बढ़ने लगी। इस बीच संसद परिसर में मौजूद सुरक्षा कर्मियों के वायरलेस सेट पर एक आवाज गूंजी कि उप राष्ट्रपति कृष्णकांत घर के लिए निकलने वाले थे, इसलिए उनकी कारों के काफिले को आदेश दिया गया कि तय जगह पर सभी कारें खड़ी हो जाएं।  संसद भवन के गेट नंबर 11 पर सभी कारें आकर खड़ी हो गयीं।

उप राष्ट्रपति के काफिले में एस्कॉर्ट वन कार पर तैनातसब इंस्पेक्टर जीतराम को सफेद एंबेसेडर सामने से आती हुयी दिखाई दी लेकिन पास आते हुए ये कार अपनी गति धीमी करने के बजाय और बढ़ाकर बाएं को मुड़ गयी जिससे जीतराम को कुछ संदेह हुआ और वो उस कार को रुकने  चिल्लाया, जिसके बाद कार पीछे की तरह आने लगी उसी दौरान वो कार उप राष्ट्रपति के मुख्य कार से टकरा गयी। वहीं जब जीताराम ने उनलोगों को डांटा तो उनमे से एक आतंकवादी ने कहा कि पीछे हट जाओ नहीं तो मार दिए जाओगे,उसके बाद सफेद कर गेट नंबर 9 की तरफ मुड़ गयी कर पर काबू नहीं रखने कारण कार किनारे पर लगे पत्थर से जा टकराई। आतंकी कार से उतरकर विस्फोटकों को जोड़कर तार बिछाने लगे।

जीतराम ने जब ये देखा तब उसने स्तनकी के पैर पर फायरिंग करना शुरू कर दिया, बदले में आतंकी भी फायरिंग करने लगे। फायरिंग के दौरान एक आतंकी और जीतराम के पैर में गोली लग गयी।कार में धमाका कर पाने में नाकाम आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। गेट नंबर 11 पर तैनात सीआरपीएफ की कॉन्सटेबल कमलेश कुमारी भी दौ़ड़ते हुए वहां आ पहुंची। संसद के दरवाजे बंद करवाने का अलर्ट देकर जेपी यादव वहां आ गया। दोनों ने आतंकियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए उन्हें वहीं मौत की नींद सुला दिया और हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए गेट नंबर 9 की तरफ तेज़ी से बढ़ने लगे।

आतंकी हमले को देखते हुए सभी वहां मौजूद सभी सांसदों और मीडिया कर्मियों को संसद में भेजा जाने लगा। सुरक्षाकर्मी लगातार चिल्ला रहे थे, आतंकवादी हमला, जो जिधर था उधर  बचाकर भागने लगा। पुलिस की वर्दी में ये आतंकवादी को देखकर लोग समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें।  इस बीच आतंकी गेट नंबर 9 से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। 4 आतंकी गेट नंबर 5 की तरफ लपके भी, लेकिन उन 4 में से 3 को गेट नंबर 9 के पास ही मार गिराया गया। हालांकि एक आतंकवादी गेट नंबर 5 तक पहुंचने में कामयाब रहा। ये आतंकी लगातार हैंड ग्रेनेड भी फेंक रहा था। इस आतंकी को गेट नंबर पांच पर कॉन्टेबल संभीर सिंह ने गोली मारी। गोली लगते ही चौथा आतंकी भी वहीं गिर पड़ा।

संसद पर हमले को नाकाम करने में तीस मिनट लगे, लेकिन इन तीस मिनटों ने जो निशानी हमारे देश को दी वो आज भी मौजूद है। पांचों आतंकियों को ढेर करने के बाद कुछ वक्त ये तय करने में लगा कि सारे आतंकी मारे गए हैं। कोई सदन के भीतर नहीं पहुंचा। तब तक एक-एक करके बम निरोधी दस्ता, एनएसजी के कमांडो वहां पहुंचने लगे थे। उनकी नजर थी उस कार पर जिससे आतंकी आए थे और हरे रंग के उनके बैग जिसमें गोला-बारूद भरा हुआ था। इस तरह से 13 दिसंबर की काली सुबह का अंत इतिहास के पन्नों में हमेशा हमेशा के लिए दर्ज हो गयी।