वाराणसी

नवरात्रि विशेष : पहले दिन इस विधि से करें मां शैलपुत्री की पूजा, जाने क्या है कथा और इनकी मान्यता

ब्यूरो रिपोर्ट। शारदीय नवरात्र का अत्यधिक मान है।हिन्दू धर्म के इस पावन पर्व पर मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। ये पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है और नवमी तिथि तक मनाया जाता है। इस बार नवरात्र 17 अक्तूबर से शुरू हो रहा है। नवरात्रि के पहले दिन लाल रंग का महत्व होता है। यह रंग साहस, शक्ति और कर्म का प्रतीक है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना पूजा का भी विधान है।

 नवरात्रि में दुर्गा देवी के नौ रूपों की पूजा-उपासना बहुत ही विधि विधान से की जाती है। इन रूपों के पीछे तात्विक अवधारणाओं का परिज्ञान धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है। आइए जानते हैं मां शैलपुत्री के बारे में…

नवरात्र के पहले दिन शैलपुत्री देवी की पूजा की जाती है। शैलपुत्री का संस्कृत में अर्थ होता है’पर्वत की बेटी।’ मां के माथे पर अर्धचंद्र स्थापित है। मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल सुशोभित होता है। माँ नंदी बैल की सवारी करती है। इसलिए ये वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा।

क्या है कथा
यह देवी प्रथम दुर्गा है और यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। इनके पीछे एक मार्मिक कहानी है। एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया लेकिन भगवान शंकर को निमंत्रित नहीं किया गया।

सती यज्ञ में जाने के लिए अधीर हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा।

वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं।

पूजा विधि
सुबह ब्रहम मुहूर्त में उठकर स्नान करें। घर के किसी पवित्र स्थान पर स्वच्छ मिटटी से वेदी बनाएं। वेदी में जौ और गेहूं दोनों को मिलाकर बोएं। वेदी के पास धरती मां का पूजन कर वहां कलश स्थापित करें। इसके बाद सबसे पहले प्रथमपूज्य श्रीगणेश की पूजा करें। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच लाल आसन पर देवी मां की प्रतिमा स्थापित करें। माता को कुंकुम, चावल, पुष्प, इत्र इत्यादि से विधिपूर्वक पूजा करें।

श्लोक
वन्दे वंछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् | वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्  ।।

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