भारत के रत्न

इस राष्ट्रकवि की कविता ने अंग्रेजों से लेकर आजाद भारत के पीएम तक को खरी खोटी सुना डाली

ब्यूरो डेस्क। देश का एक ऐसा राष्ट्रकवि जिसकी कविताओं में ओज, आक्रोश और क्रांति की पुकार है। स्वतंत्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में उसकी पहचान होती है और आजाद भारत में राष्ट्रकवि के नाम से जाने जाते है। हिंदी की कविता को अगर जनमानस में पहचान मिलती है, तो वह इस कवि से मिलती है। हम बात कर रहे है, बिहार की धरती पर जन्म लेने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की। इनकी कविताएं हमेशा सूर्य के प्रकाश की तरह उजाला ही किया है।

नीरज ने अपनी एक कविता में लिखा है कि-
आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य, मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य।
पंक्तिया रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के लिए सही बैठता है।’ इनकी रचनाऐं सड़क से लेकर संसद तक सुनाई दिया। ये भारतीय राजनीति और भारतीय कविताओं के अप्रतिम उदहारण है।
इनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले का सिमरिया गांव में हुआ। पिता रवि सिंह की मौत जब दिनकर आठ वर्ष के थे तभी हो गया। परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। उस दुःख की बेला में गांव वालो ने साथ दिया। बचपन में इनका नाम नूनूआ था। उनके बड़े भाई का वसंत सिंह का निर्णय उनको राष्ट्रकवि के सफ़र तक पहुंचाता है। भाई का फैसला था कि हम दो भाई काम करेंगे और रामधारी पढ़ेगा। इस फैसले में उनका छोटे भाई ने सर हिलाकर अपनी सहमति जताई। दिनकर 12 वर्ष की उम्र में पहली कविता लिखी। ये हर रोज सिमरिया और मोकामा के बीच उस लम्बी चौड़ी गंगा को पार करके पढ़ाई करने जाते थे। इस ज्ञान की यात्रा में गंगा के उस चौड़ी पाट को हाथो से पार करने की पीड़ा इस लहरों को देख सागर के प्रति भाव जगा हो। उस कल्पना को उन्होंने अपनी कविता में लिखा राम के द्वारा जब समुन्द्र से रास्ता मांगा गया –
तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिंधू किनारे ,
बैठे पढ़ते रहे छंद अननय के प्यारे -प्यारे
उत्तर में जब एक नाद भी उठा नही सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के गर से
सच पूछो तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की
संधि -वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की
शुरूआती समय से ही इनके कंधो पर परिवार की जिम्मेवारी रही। इस आर्थिक तंगी को कम करने के लिए उन्होंने अंग्रेजो के निबंधन विभाग में नौकरी किया। अपनी लेखनी की बदौलत नौकरी पाई और उसी के चलते परेशानियों का सामना भी किया। एक कविता में उन्होंने आजादी पाने की इच्छा को व्यक्त किया —
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चांद ,
आदमी भी क्या अनोखी जीव होता है
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते आ रहे है वे
रोकिए जैसे बने इन स्वप्न वालों को
स्वर्ग की ओर बढ़ते आरहे है वे

कहां जाता है कि 1938 से 1943 तक 22 तबादले हुए फिर उन पर कोई असर नहीं पड़ा और उन्होंने उस समय देश की आजादी से जुड़े हुए लोगो के लिए लिखा
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य -प्रकाश तुम्हारा
लिखा जा चुका अनल -अक्षरों में इतिहास तुम्हारा
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही
अंबर पर गहन बन छाएगा ही उच्छवास तुम्हारा
और अधिक ले जाँच देवता इतना क्रूर नही
थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। उनकी काव्य संग्रह में कुरुक्षेत्र, उर्वशी,रेणुकी, हुकर, परशुराम की प्रतिज्ञा के अलावा कर्ण पर ही रश्मिरथी जैसा महाकाव्य लिख देना उनकी योग्यता को बताता है।
जब 1962 में भारत चीन से युद्ध में हार गया तो नेहरू की शांति नीति पर इस कदर भड़के की उन्होंने लिखा
रे रोक युधिष्ठिर को न यहां
जाने दे उसको स्वर्ग धीर
पर फिर हमें गान्डीव -गदा लौटा दे अर्जून ,भीम वीर
कह दे शंकर से आज करें वे प्रलय -नृत्य फिर एक बार
सारे भारत में गूंज उठे हर -हर बम -बम का महोच्चार।
आजादी के बाद वह जनसम्पर्क विभाग में उप निदेशक के तौर कार्यरत रहे। आजादी के पहले से ही वह कांग्रेस से जुड़े थे और 1952 में राज्य सभा के लिए तीन बार चुने गए और राज्य सभा को 1964 को छोड़ दिया। उसके बाद उन्होंने बच्चों को पढ़ाया भी। उम्र के बढ़ते 66 साल के उम्र तक आते ही ज्यादा बीमार होने लगे। अंत समय में वह तिरुपति में चले गए। उन्होंने वहां रश्मिरथि का पाठ करने लगे –
यह देख गगन मुझमें लय है
यह देख पवन मुझमे लय है
मुझमें ले है संसार सकल
अमरत्व फूलता है मुझमें
संहार झूलता है मुझमें
उदयाचल मेरा दीप्त माल
भूमण्डल वक्ष स्थल विशाल भुज परिधि -बांध को घेरे है
मैनाक -मेरु पंग मेरे है
इस कविता पाठ के बाद रामेश्वरम के तीर्थ स्थल पर अपने जीवन का अंतिम सांस लिया 24 अप्रैल 1974 को।
इस राष्ट्रकवि को संस्कृत ,बांग्ला ,अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया और हिंदी का आशीर्वाद तो बचपन से ही रहा। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का हिन्दी के प्रति इनके अधिक समर्पण एवं योगदान के कारण इन्हें “ज्ञानपीठ पुरस्कार” से भी सम्मानित किया गया !
सन 1959 ई० में भारत सरकार ने इन्हें “पदमभूषण” से सम्मानित किया तथा सन 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय ने डी० लिट्० की उपाधि प्रदान की।

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