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10 साल से लापता है घर का चिराग, नहीं मिला अब तक कोई सुराग 

वाराणसी। एक पिता के बेटे को गायब हुए लगभग 10 साल हो गए हैं, लेकिन पुलिस अब तक उसका पता नहीं लगा पाई है। पिता सीएम योगी से लेकर पीएम मोदी तक गुहार लगा चुके हैं, पर अब तक इसपर प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गयी। वहीं बहन हर राखी पर अपने भाई का इंतज़ार करती है लेकिन भाई नहीं आता। देखिये रिपोर्ट –

वाराणसी के औसानगंज निवासी अशोक जायसवाल को दो बेटी व दो बेटे थे, जिसमें एक छोटा बेटा जो कमासुत था। घर का जिम्मेदार लड़का था, जिसके कंधों पर दो बहन, एक भाई की शादी की जिम्मेदारी थी। घर का इकलौता कमाने वाला लड़का सुनील जायसवाल सिमेंट का कारोबार करता था। सुनील कम समय में इतना आगे निकल गया था कि दुश्मनों को उसके खुश रहने का तरीका हजम नहीं हुआ। 6 जून 2009 को परिवार वालों पर ऐसी गाज गिरी की उनके बुढ़ापे का सहारा उनसे जुदा हो गया। मां, बाप, भाई और बहन को अपनी याद में छोड़ गया।

सुनील को गायब हुए लगभग 10 साल बीत चुके है। न्यायालय भी सात साल तक न मिलने वाले लापता व्यक्ति को मृतक घोषित कर देती है,लेकिन इस बात को सुनील के घरवाले आज भी मानने से इंकार करते हैं। उनको आज भी इंतजार है अपने बेटे का। वहीं बहन सुनीता व ज्योति को आज भी अपने भाई के आने का इंतजार है, जो हर साल राखी के त्योहार पर भाई के तश्वीर को भीगीं आंखों से निहारती रहती हैं। अंत में सब्र का बांध जब टूट जाता है तो भाई के फोटो पर ही राखी की रस्म अदायगी कर उसके लंबी उम्र की कामना करती हैं।

विकलांग पिता अशोक जायसवाल के कंधे पर एक बेटी और एक बेटे के शादी का बोझ है। किसी तरह वो फुटकर में सिमेंट बेचकर अपना और अपने परिवार का लालन-पालन कर रहे हैं। पिता अशोक ने बताया कि सुनील के गायब होने के बाद घर में परेशानियों का सिलसिला शुरु हो गया। रात दिन काम करने के बाद कहीं दो रोटी का इंतजाम हो पाता है।

वहीं दूसरा बेटा सुशील जो भाई के साथ उसका दोस्त बनकर काम में हाथ बंटाता था। सुनील के गायब होने के बाद वो भी अकेला सा हो गया और हमेशा उसकी याद में पागलों की तरह यहां वहां भटकता रहता था। आज भी सुशील दिमागी तौर पर मजबूत नहीं, जिससे घर का हाथ बटा सके। वहीं मां उषा देवी व पिता अशोक जयसवाल दोनो की आंखे बेटे के इंतजार में बूढ़ी होती चली जा रही है।

हर होली और दीवाली को सूनी आंखों से बेटे का इंतजार करती मां उषा देवी बताती हैं कि 6 जून 2009 को सुशील रात में घर से बाहर किसी काम से निकला और फिर आज तक वापस नहीं आया। बेटे की हर जगह तलाश की गई, लेकिन उसका कहीं कुछ पता नहीं चला। उस दौरान हम लोगों ने शासन प्रशासन से लेकर आलाअधिकारियों के खूब चक्कर लगाये, लेकिन आज तक बेटे की तलाश खत्म नहीं हुई। जो जहां कहता वहां जाकर बेटे की खोजबीन की मगर हाथ सिर्फ निराशा ही लगी।

बेटे की तलाश ने परिवारी को तोड़कर रख दिया। मां जहां हमेशा बीमार रहने लगी, तो घर में पैसे की दिक्कत होने लगी। किसी तरह से रिश्तेदारों व आस पड़ोसियों से उधार पैसे लेकर इलाज व घर का खर्च चलता रहा। इस दौरान बड़ी बेटी की शादी भी तय हो गयी। किसी तरह तो घर मकान गिरवी रख कर शादी ब्याह कर दिया गया। वहीं दूसरी बेटी भी शादी के लायक हो गयी अब चिंता इस बात का है कि छोटी बेटी की शादी कैसे होगी? सुनील के गम ने परिवार को खड़ा होने का समय ही नहीं दिया।

अब इस परिवार की उम्मीदें शासन और प्रशासन से पूरी तरह से टूट गई हैं। इन्हें भरोसा है तो सिर्फ भगवान पर जिसके दर पर माथा टेंकने के सिवाय अब इनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा है।

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