गुलाम भारत में आजाद भारत की गाथा लिखने वाले मदनमोहन मालवीय

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डेस्क रिपोर्ट। देश गुलामी के जंजीरो में जकड़ा हुआ था। चारो तरफ आजादी की चिंगारी भभक रही थी कि इसी बीच बालियां से क्रांति का बिगुल फूंक दिया गया था। गुलाम भारत को आजाद करने के लिए गरम और नरम दोनों दलों द्वारा लगातार प्रयास किये जारहे थे। इन्ही सब घटनाक्रमों के बीच तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद ) के अहियापुर में स्थित पं ब्रजनाथ एवं मूना देवी के घर में एक बालक का जन्म हुआ, जो आने वाले समय का कुशल राजनीतिज्ञ, दूरदर्शी शिक्षाविद, संवेदनशील समाज सुधारक, समर्पित देश भक्त और धर्मपरायण नेता एवं देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से विभूषित होने वाला था। वह कोई और बालक नही बल्कि पण्डित मदनमोहन मालवीय थे।

अपने जीवन काल में ये जिस क्षेत्र से जुड़े वहां अपनी एक अलग ही पहचान बनाई। इनके पिता पं ब्रजनाथ जब गया (बिहार ) में पूर्वजों का पिंडदान किया। उसके बाद पुरोहितो ने कहां कि “इच्छा पूर्ति के लिए प्रार्थना करे”। उस समय वे पूर्व की ओर दिशा करके कहे कि “हे भगवान हमें ऐसी संतान दे जिसकी बराबरी का पहले कभी न कोई हुआ हो, ना आगे कभी हो। शायद ऐसा ही हुआ मदनमोहन मालवीय के जैसा उस दौर में भी न कोई था और आज भी कोई नहीं है| उनमें इतनी प्रतिभा, योग्यता और परिश्रमशीलता थी कि यदि वे खाने कमाने में लगे रहते तो निश्चय ही उनकी गिनती उस दौर में धनवानों में किया जाता। देश और समाज के लिए उन्होने यह मार्ग न अपना कर बल्कि त्याग और आत्म- बलिदान के रास्ते को अपनाने का निर्णय लिया।

शिक्षा और कैरियर

सम्राट ह्रदय, व्यक्तित्व के धनी और अपनी महानता के कारण ही पुरे विश्व ने उनको ‘महामना’ के नाम से सम्बोधित किया। मालवीय जी की प्रारंभिक शिक्षा पांच वर्ष के शुरू हुआ। ब्राह्मण परिवार से तालुक रखते थे। पिता संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे और श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर परिवार का खर्च चलाते थे। यही वजह भी रही कि मालवीय संस्कृत भाषा में शिक्षा लेने के लिए पण्डित हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला प्रवेश इनके पिता ने दिलवाया यहां से प्राइमरी तक की पढ़ाई की। यह कहना गलत नहीं होगा कि संस्कृत के ज्ञान ने ही इनको धर्मपरयाण की सोच को विकसित किया। 1879 में, म्योर सेंट्रल कॉलेज इलाहबाद (इलाहबाद विश्वविघालय ) से दसवीं की परीक्षा पास किए। आगे की पढ़ाई के लिए अन्य विघालय में प्रवेश लिया। इस अवधि में इन्होने कविता भी लिखी। मकरंद के उपनाम से कवितायें लिखते थे। 1884 ई० में बी०ए० की उपाधि कलकत्ता विश्वविघालय से प्राप्त की। घर की आर्थिक स्थिति सही न होने के कारण आगें की पढ़ाई न करने का निर्णय लिया। शिक्षक बनकर छात्रों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश जलाने का निर्णय लिया।

पत्रकारिता से वकालत तक का सफ़र

जुलाई 1887 में शिक्षक की नौकरी छोड़कर वे पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखे। ढाई वर्ष तक इन्होने ‘हिंदुस्तान’ दैनिक पत्र का संपादन राजा रामपालसिंह के आग्रह पर किया। इसका संपादन करने का निर्णय के पीछे एक शर्त भी रामपालसिंह से रखा की वे मद्य पिये हों तो उनको बातचीत के लिए न बुलावें,अन्यथा वे वहाँ कार्य न करेंगे। ढाई वर्ष तक यह कार्य चलता रहा। एक दिन नशे में राजा साहब से भूल हो गई अउ उन्होंने मालवीय को उस समय बुला लिया। ज्यों ही मालवीय को उनके शराब पीने की जानकारी हुई, त्यों ही बात समाप्त करके वे इलाहबाद के लिए निकल पड़े। राजा रामपाल सिंह को अपनी गलती को स्वीकार किया। उन्होंने महामना से संपादन के लिए पुनः अनुरोध किया, पर वे नहीं माने। तब राजा साहब ने उन्हे वकालत की पढ़ाई करने की सलाह दी और पढ़ाई का तमाम खर्च उठाने का वादा किया। मालवीय के इनकार करने के बावजूद भी वे हर महीने 250 रुपए उन्हें भेजते रहे। वकालत की पढ़ाई पूरी हुई और वकालत से खुद पैसा भी कमाए। ये कहा जाता है कि वे कम ही समयों में इलहाबाद हाईकोर्ट के नामी गिरामी वकीलों में इनकी गिनती होने लगी। मोतीलाल नेहरु भी इन्हे सुयोग्य वकील मानते थे। अपने वकालत के पेशे में भी इन्होने सेवा -भावना का त्याग नहीं किया। एक बार जब एक गरीब कोर्ट के बाहर उदास बैठा था। वह आदमी मालवीय के पास गया और उनको अपना दुःख बताया की मेरे पास पैसा नहीं है कि मै अपने वकील को फीस दे सकू। वे उस समय दूसरे काम में व्यस्त थे। उन्होने एक आदमी को उस गरीब व्यक्ति के साथ वकील मुंशी गोकुलप्रसाद के पास भेज दिया जो उस व्यक्ति का वकील थे। बिना कुछ खर्च के उसका काम हो गया। एक समय के बाद वह वकालत छोड़ दिए और समाज सेवा और देश को आजाद कराने के लिए संघर्ष करने लगे। कहा जाता है कि जब 4 फरवरी 1922 को स्वतंत्रा सेनानियों की भीड़ ने चौरीचौरा पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर दिया गया था। उस पर सेशन जज ने 170 लोगों को फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद यह मामला इलहाबाद हाईकोर्ट में गया। उस समय देश के नेताओं ने कहां कि इस मुकदमे को केवल मालवीय ही लड़ सकते है, जबकि दो दशक पहले ही इन्होने वकालत छोड़ चुके थे। उनकी दलीलें इतनी लाजवाब थी कि मुख्य न्यायधीश चीफ जस्टिस सर ग्रीमवड मेयर्स तीन बार बेंच से उठकर अभिवादन किया। ब्रिटिस शासन और न्यायप्रणाली की अद्वितीय घटना थी। यह वाक्य किसी चमत्कार से कम नहीं था अभियुकतों में से 150 लोगों को फांसी की सजा नहीं हुई। इन्होने अपने पत्रकरिता के क्षेत्र में भी अद्भुत कार्य किये। हिंदोस्थान, अभ्युदय, द लीडर और मर्यादा का संपादन और प्रकाशन किये।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना

1916 में नये उभरते भारत की नींव रखी गई। उन्होने भारत के गौरव स्तंभ की स्थापना काशी हिन्दू विश्वविद्यालय रूप में की। आठ किलोमीटर की परिधि में बना यह विश्वविद्यालय दुनिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय है। भारत में विज्ञान प्रौघोगिकी शुरुआत यही से हुई। यह पहले व्यक्ति थे जो भारतीय विज्ञान के उज्जवल नक्षत्रों और पश्चिमी की नवीन प्रतिभाओ को एक साथ लाए। महामना इस शिक्षा के केंद्र को स्थापित करते हुए कहां था कि “काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना से विश्व को यह विशेष संदेश जाता है,कि हमने सरस्वती के मंदिर में ज्ञान का दीप प्रज्वलित किया है”। धर्मप्राण महामना ये मानते थे की सभी को शिक्षा का एक समान अधिकार मिले चाहे वह लड़का हो या लड़की। एक बार एम० ए० संस्कृत -विभाग में पढ़ाने वाले एक अध्यापक ने एक लड़की को वेद पढ़ाने से इनकार किया था, पर मालवीय ने उस शिक्षक के निर्णय का विरोध किया और उसको पढ़ने की अनुमति दी। अपने इस बगिया को बनाने के लिए मालवीय ने चंदा लेने के किसी के पास जाने में संकोच नहीं करते थे। कई विद्वानों ने तो उन्हें ‘भिक्षुक – सम्राट ‘की पदवी दी थी। इनका साहस ही था, जो उन्होंने अकेले ही ‘हिन्दू विश्वविद्यालय ‘ इतनी बड़ी संस्थान खोलने का संकल्प कर लिया। इनकी वाणी में इतनी मधुरता थी कि जिनके पास ये चंदा लेने जाते वे बिना किसी सवाल जवाब के ही उनको चन्दा दे देते थे। इनके वाणी की मधुरता पर एक शायर की यह कथन बिल्कुल सच बैठता है –

असर लुभाने का प्यारे ! तेरे बयान में है।
किसी की आँख में जादू,तेरे जबान में है।

वहीं इनके चंदा मांगने पर यह दोहा पूरी तरह लागू होता है और यह किस्सा भी जो उन्ही से जुड़ा है –

मर जाऊँ माँगू नहीं, अपने हित के काज।
पर -कारज हित माँगिबो, मोहि न आवै लाज।।

राजा बलदेवदास बिड़ला धन दान करना चाहते है किन्तु शर्त उनका यह है कि कोई ब्राह्मण उसे गंगाजी में बैठकर ग्रहण करे। इस बात की जनकारी मालवीय को पता चला और वह तुरंत तैयार हो गये। काशी के पंडितो ने इसका विरोध किया। मालवीय ने इस विरोध को नजर अंदाज करते हुए वे गंगाजी के भीतर खड़े होकर दान की रकम बिड़ला से लिए। वे अपने इस संस्थान में पढ़ने वाले विघार्थियों पर विशेष ध्यान देते थे। एक पिता जिस तरह से अपने पुत्र का ख्याल रखता है। जरुरत आने पर क्रोधित होना तो समय पर दया भी दिखाना। एक किस्सा सुनने में आता है कि एक छात्र आचार्य के अंतिम वर्ष की परीक्षा देने वाला था और उसके पिता का उसी समय देहांत हो गया। उसको घर से आने में देरी हो गई। इस देरी के कारण उसकी उपस्थिति कम हो गई और नियमानुसार उसको परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया। तब वह महामना के पास गया और श्लोक के माध्यम से अपनी प्रार्थना को उनके सामने रखा।

या त्वरा द्रौपदी त्राणे या त्वरा गजमोक्षणे।
मय्यारर्ते करुणानाथ ! सा त्वरा क्व गता हि ते।।

“द्रौपदी के उद्धार और गजराज की रक्षा में आपने जो शीघ्रता प्रकट की थी, हे करुणामय !मेरी विपत्ति के समय वह शीघ्रता कहाँ चली गई” ? यह बोलते ही वह रोने लगा और यह वाक्य को सुनकर महामना के भी आँखों में आंसू की धारा बहने लगी। उसी वक्त उस प्रार्थना -पत्र पर उन्होंने परीक्षा में बैठने की अनुमति दिया। ऐसा ही एक वाक्या है की मालवीय रात्रि के समय एक छात्रावास में निरक्षण करने के लिए निकले तब एक कमरे में एक विघार्थी कमरे में चूल्हे पर दूध गर्म कर रहा था। यह देखकर वह बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कहां की कमरे में चूल्हा जलाना नियम के विरुद्ध है। उस पर उन्होंने उस विघार्थी पर पांच रुपए का जुर्माना किया। उनकी दयालुता ही थी की घर आकर वह पांच रुपए जुर्माना के उस लड़के को भेजा और कहां की पैसा जमा करो और आगे इस तरह की गलती न करे।

धर्मप्राण थे महामना

मालवीय धर्म को प्राण की तरह प्रिय समझते थे। जब अंग्रजो ने हरिद्वार में गंगा नहर बनाने का निर्णय लिया। उस समय मालवीय ने सरकार की कड़ी निंदा की। वे हिन्दुओं के आध्यात्मिक और महाराजाओ का शिष्ट मंडल लेकर लेफ्टिनेंट गवर्नर से मिले और कहे की —-

“आपको यह बताना जरुरी नही है कि गंगा के लिए हिन्दुओं के मन कितना आदर है। देश भर से लाखों लोग गंगा में नहाने और अपने पाप धोने आते है| उन्होंने गंगा के पावन जल तक पहुंचने का अधिकार देना चाहिए। चाहे खर्च कितना भी हो। आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए गंगा की धारा, हर की पौड़ी, दूसरे पवित्र घाटों पर गंगा बहती रहे निर्वाह गति से। लेफ्टिनेंट के पास कोई चारा नहीं था कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करें कि बांध का एक मोहना सदा मुक्त रखा जाएगा। आगे हिन्दुओ के सलाह के बिना कोई निर्णय नहीं लिया जाए।

वे सदा हिन्दू को दयावान बनने के लिए प्रेरित करते थे। एक बार केरल में बोपलाओ और स्थानिय लोगो के साथ संघर्ष हुआ तब इसे शांत करने के लिए कोचीन पहुंचे और हिन्दू नेताओ से कहे कि “जिसने आपके साथ भलाई की है, उसके साथ भलाई करना तो आसान है। बड़प्पन तो इसमे है कि जिसने आपके साथ बुराई की है, उसके साथ भी भलाई करें| यही हिन्दू धर्म का सार है।

राजनीति और उद्योग के क्षेत्र में भी किये सराहनीय कार्य

1886 में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में भाग लिया। 1909 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने वे चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। महात्मा गांधी भी महामना के विचारो से काफी प्रभावित थे| वे खुद कहते है कि “जब मै पहली बार भारत आया और मालवीय से मेरी मुलाकात हुई तो वो मुझे गंगा की धारा की तरह निर्मल और पवित्र लगे। मैंने तय किया कि मै उसी निर्मल धारा में गोता लगाउँगा। मेरे चरित्र में दाग हो सकते है लेकिन मदनमोहन मालवीय बेदाग है। वे प्रातः स्मरणीय ऋषि है। सुबह -सुबह उन्हें याद करने से लोग स्वार्थ के दल -दल से बहार निकल सकते है।

उन्होंने भारत में उद्योग के संदर्भ में अपनी राय रखते हुये कहते है कि “स्थानिय कच्चे माल का उपयोग किया जाए। दूसरी नये -नये उद्योग शुरु किये जाए और तीसरी बात यह मुनाफा देश में ही रहे। अगर इस भावना के साथ भारतीय उद्योग के विकास किये जाएंगे तो भारत समृद्ध और सबल बनेगा। यह सब बाते इन्होने भारतीय उघोग एवं अर्थव्यवस्था को तबाह करने की ब्रिटिश सरकार की साजिश का पर्दाफाश किया। अपनी राय रखी।

जीवन के अंतिम क्षण
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्।।

‘मै राज्य की कामना नहीं करता। मुझे स्वर्ग और मोक्ष नहीं चाहिये। दुःख से पीड़ित प्राणियों के कष्ट दूर करने में सहायक हो सकूँ यही मेरी कामना है’। यह सोच ही था जो इस महापुरुष को महान बनाया। अपने जीवनकाल में ऐसा कार्य करके गए, जिसकी गाथा आज लोग बड़े गर्व के साथ बताते है। एक दिन ऐसा भी समय आया, जब 12 नवम्बर 1946 जिसने गुलाम भारत में जन्म लिया और आजादी के एक साल पहले ही गुलाम भारत में ही शाम के समय दुनिया से विदा लिया अपने कर्म भूमि काशी से। काम कुछ ऐसा कर गए उस गुलाम भारत में जो शायद आजाद भारत में एक पुरुष के लिए संभव नहीं है| काशी हिन्दू विश्वविघालय की इमारते यह बताती है एक तेजस्वी पुरुष के कर्मो की गाथा। तभी तो सोहन लाल द्विवेदी लिखते है महामना को याद करके —

मिले तुम्हारी भक्ति देश को, जय जननी जय गान करें।
मिले तुम्हारी शक्ति देश को, नित्य वह उत्थान करें।
मिले तुम्हारी आग देश को, आजादी आहवान करे।
मिले तुम्हारी त्याग देश को, तन, मन, धन बलिदान करें।

मृत्यु के 68 साल बाद 24 दिसम्बर 2016 को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न ‘ देकर सम्मानित किया।