शिक्षक से लेकर महाकवि तक सफ़र : माखनलाल चतुर्वेदी

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ब्यूरो डेस्क। गुलाम भारत के समय का एक ऐसा स्वतंत्र कवि,जिसने अपनी कविताओं और लेखन से युवाओं पर उस दौर में ऐसा प्रभाव डाला की। वे अपने सर पर कुर्बानी का कफ़न बांधकर भारत को आजद करने के लिए निकल पड़ते थे| आज हम “भारत के रत्न ” सीरीज में लिखने जा रहे है। “पद्म भूषण” से सम्मानित कवि, लेखक, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी के बारे में।

ये कहना गलत नहीं होगा कि माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा की गई रचनाएं| उनकी विद्वता को बताने के लिए काफी थे। इनके द्वारा लिखी हुई कविता “पुष्प की अभिलाषा” जो मार्च 1922 के समय प्रताप में प्रकाशित किया गया। ये कविता उस समय के क्रांतिकारियों के जेबों में लिखी मिलती थी। सुनने में आता है कि हुगली नदी के किनारें क्रांतिकारियों की लाश मिली। उनके जेब से “पुष्प की अभिलाषा” की कविता मिली। इस कविता में लिखते है –

चाह नहीं ,मै सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं ,मै प्रेमी की माला बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं ,सम्राटों के शव पर हे हरि ,डाला जाऊँ
चाह नहीं ,देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना बनमाली ! उस पथ में देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जावें वीर अनेक

माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई गांव में हुआ| पिता नंदलाल चतुर्वेदी शिक्षक थे| प्राइमरी तक ही इन्होने पढ़ाई किया और वह भी उस विघालय में जहाँ इनके पिता नंदलाल चतुर्वेदी पढ़ाते थे। पिता की तरह ये भी शिक्षक बनना चाहते थे, मगर दादा चाहते थे पुजारी बने। घर की आर्थिक स्थिति सही न होने के कारण इन्होंने नौकरी करने का निर्णय लिया । प्राइमरी की डिग्री की योग्यता के साथ प्राइमरी ट्रेनिंग की परीक्षा पास किया| शिक्षक की नौकरी करने खंडवा पहुंच गए। इनकी शादी 14 साल के उम्र में नौ साल की ग्यारसी बाई से हुई,जिनकी मृत्यु शादी के दस बारह साल के बाद ही हो गई । एक बेटी भी हुई वह जन्म के कुछ दिनों बाद दुनिया को छोड़ कर चली गई। उसके बाद इन्होने अपना पूरा जीवन लेखनी और भारत को आजाद कराने के लिए समर्पित कर दिया।

1912 में इन्होने “शक्ति पूजा” लेख लिखा। वह इस कदर चर्चा में आया की इन पर अंग्रेजों के द्वारा राजद्रोह का मुक़दमा लगा दी गई। तब दोस्तों ने कहां की ‘ अपनी लेखनी के तेवर में बदलाव लाओ नहीं तो आजदी की लड़ाई कैसे लड़ी जाएगी| उसके बाद उन्होंने उपनाम के साथ लिखना शुरु किया था। सुधार ,पशुपति ,निति प्रेमी, एक भारतीय आत्मा के नाम से लेखन शुरु किया। एक भारतीय आत्मा के बदौलत गांधी ने उनको भारतीय आत्मा का उपनाम दिया| दूसरी बार इन पर राजद्रोह का मुक़दमा 12 मार्च 1921 को बिलासपुर की सभा में भाषण देने पर लगा। एक साल जेल भी रहे। बताया जाता है कि जब उनको जज के सामने पेश किया गया तो उन्होंने कहां कि “मैंने कोई अपराध नहीं किया। देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया है।मै किसी ब्रिटिश कोर्ट से न्याय नहीं चाहता। मातृभूमि को गुलामी से मुक्ति कराने से अच्छा कोई सेवा नहीं। इसके बाद उनकी जज के साथ पूरी बाते अंग्रेजी में ही हुई, जो इतना शानदार था कि जज भी आश्चर्यचकित हो गया था।

जब 1930 में नमक सत्याग्रह ,सविनय अवज्ञा आंदोलन जिसकी अगुवाई इन्होने भी किया था। उसके चलते इन्हे जबलपुर जेल में डाल दिया गया। तब उन्होंने कैदी और कोकिला के बीच तुगबंदी लिखी-

इस शांत समय में ,
अंधकार को बेध ,रो रही क्यों हो
कोकिल बोलो तो
चुपचाप, मधुर विद्रोह बीज
इस भाँती बो रही क्यों हो
कोकिल बोलो तो

उस समय जेल में कागज और कलम नहीं हुआ करते थे। तब जेल की साफ दीवारों पर कोयले से माखनलाल चतुर्वेदी लिखा करते थे। इस पर गांधी कहते थे कि “माखन बहार से ज्यादा जेल में रहकर आजादी के लिए सही काम करता है”। वे जब 1913 में अपनी नौकरी छोड़ दिया। उसके बाद तो मानो कलम की धार इस कदर तेजी से चलती थी कि क्रांतिकारियों में नया उमंग भर देती थी।अंग्रेजों के लिए परेशानी खड़ा कर देती थी| 1916 में भारत की तकलीफ को देखते हुए उन्होंने लिखा कि –

देश के वंदनीय वासुदेव ,
कष्ट में ले न किसी की ओट
देवकी माताएँ हो साथ
पदों पर आउंगा मैं लौट
जहाँ तुम मेरे हित तैयार
सहोगे कर्कश कारागार
वहाँ बस होगा मेरा धाम
गर्भ का प्रियतर कारागार

उसके बाद एक कविता में लिखते है की —

देश अजातशत्रु ! हम तुम
पर निज सर्वस्व चढ़ा देंगे
वीर -पार्थ !रुक जा
तेरा कृष्ण सारथी ला देंगे।

इनके कविताओं का संग्रह का प्रकाशन 1943 के बाद हुआ। उसके बावजूद भी उनकी कविता उनके द्वारा पढ़ें जाने पर ही आम लोगों में चर्चित रहता था। प्रकाशन की गई कविताओं में हिमकिरीटनी ,हिम तरंगिणी ,बिजुरी काजल आँज रही अन्य रहे और उनकी मृत्यु के बाद 1981 में ध्रम वलय प्रकाशन किया गया।

माखनलाल, बालगंगाधर से काफी प्रभावित थे| उनके दिशा निर्देश का पालन करते हुए| वे काशी में उस दौर के बड़े क्रांतिकारी सखाराम गणेश देउसकर से बकायदा क्रांतिकारी के रूप में दशाश्वमेध घाट पर हाथ में बंदूक लेकर शपथ लिया। अपने खून से उन्होंने हस्ताक्षर भी किया ,जिसमे लिखा था की अगर मै देश के लिए देश द्रोही हुआ तो मुझे इसी बंदूक से गोली मार दिया जाए। कुछ सालों के बाद 1919 में बीएचयू के स्थापना दिवस पर उन्होने गांधी का व्यख्यान सुना उसके बाद उनसे प्रभावित हुए| पिस्टल तो छोड़ दिया पर क्रांतिकारियों से नाता नहीं छोड़ा| उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कई अखबारों में काम किया, जिसमे कहां जाए तो कर्मवीर से ज्यादा लगाव रहा ,उसके अलावा प्रताप और प्रभा मासिक पत्रिका ने पत्रकारिता के क्षेत्र में इनको पूरी तरह से लेकर आई।
माखनलाल चतुर्वेदी कविता केवल क्रन्तिकारी सोच की नहीं थी उनकी कविताओं में दुःख भी झलकता था। तिलक जी की मृत्यु की खबर जब सुना तो लिखा –

क्यों आर्य ! देश के तिलक चले
क्यों कमजोरों के जोर चले
तुम तो सहसा उस ओर चले
यह भारत माँ किस ओर चले
तेरी हुंकार का फल था
अगणित वीरों ने प्राण दिया
राष्ट्र शक्तिने तुझ से ही
अमृतसर में था त्राण लिया

इस सपूत ने आजादी के जो सपने देखे थे| उसने जो कल्पना किया था। काशी के दशाश्वमेध घाट पर क्रन्तिकारी बनने का शपथ लिया,जिन हाथो में कलम और कमर में बंदूक होता था। गांधी के विचारो ने उस बंदूक को हटाने पर मजबूर कर दिया। एक दिन यह वीर रस का कवि उसी गांधी के समाधी पर खूब रोया और लिखा –

अब तो मरने की यादों का
तीरथ है, केवल राजघाट
तकली ,चरखा ,दलित ,हिंदी
छूटा भ्रम ,झूठा ठाठ -बांट
हम राजा है ,हम रानी है
दुखियो के मरने की खबरें
पाते वतव्य छापते हैं ,हम

एक रोज समय वह भी आया दिनांक 30 जनवरी 1968 और इस दिन दुनिया को अलविदा कह कर चला गया ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाला हिंदी का बेटा माखनलाल चतुर्वेदी।