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सरैयां इमामबाड़ा में 72 साथियों की याद में निकाला गया ‘जुलूस—ए—ताबूत’

वाराणसी। इमाम हसन हुसैन ने इस्लाम के खातिर अपने पूरे कुन्बे सहित 72 साथियों ​के साथ कर्बला के जंगी मैदान में यजीदो के हाथों शहीद हो गये थे। इसी याद ताजा करने के लिए मोर्हरम मनाया जाता है जिसे गम ए आशुरा कहा जाता है। और हर साल मोर्हरम के तीसरे रविवार को जुलूस ए ताबुत निकाला जाता है।

गौरतलब है कि इन्ही ताबुतों में एक एैसा ताबुत होता है जिसे देख कर अजादारों की आंखे नम हो जाती है। वो हैं 6 माह के बच्चे अली असगर जिनकों दुश्मनों ने तीरो से छलनी कर दिया था। उस वक्त वो मंजर था जब प्यासे अली असगर के लिए इमाम तालाब से पानी लेने के लिए घायलअवश्था में चले थे तभी यजीद के सिपाहियों ने उस मासुम को तीरों से छलनी कर दिया।

इस जुलूस में हजारों की संख्या में अकीदतमंद आते हैं और 72 ताबूत की शक्ल में जनाजे को एहतमाम कर आंसूओं का नजराना पेश करते हैं। इस दौरान बच्चें व महिलाएं मातम करते हुए इमाम हुसैन के कुनबे को याद करते हुए गम के आसूरा में सराबोर हो जाते हैं।

बता दें कि इस 72 जनाजे में एक ऐसा जनाजा जियारत के लिए सबसे पहले निकाला जाता है वो इमाम हसन के छह माह के पुत्र अली असगर का होता है, जिसके जियारत को करने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता हे।वहीं मौलाना के द्वारा जब इस जनाजे के बारे में तकरीर की जाती है तो सभी अकीदतमंदों की आंखें नम हो जाती हैं।

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