अधिवक्ता से मुख्य न्यायाधीश तक का सफर

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डेस्क रिपोर्ट। भारत के मुख्य न्यायाधीश पर लगने वाले यौन उत्पीड़न का मामला हो या कई दशकों से राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद का मामला कई ऐसे महत्वपूर्ण फैसले की सुनवाई करने वाली पीठ के सदस्य रहने वाले जज की है ये कहानी, जिनके दिए फैसले कहीं न कहीं आम जनमानस में चर्चित रहा है। अगस्त 2017 में तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ का हिस्सा रहे और निजता के अधिकार को एक मत से संविधान के मौलिक अधिकार करार दिया। हम बात कर रहे है भारत के 47 वें सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई ) 63 वर्षीय जस्टिस एस.ए. बोबड़े, जिनका पूरा नाम शरद अरविन्द बोबड़े है। चीफ जस्टिस रह चुके रंजन गोगोई के रिटायरमेंट के बाद उस पद पर 18 नवम्बर को आसीन हुए। सीजेआई के तौर पर जस्टिस बोबडे का कार्यकाल करीब 17 महीने का होगा और वह 23 अप्रैल, 2021 को सेवानिवृत्त होंगे।

महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ सीजेआई बोबडे का जन्म
वकालत वाले परिवार से तालुक रखने वाले जस्टिस बोबडे का जन्म 24 अप्रैल 1956 को नागपुर में हुआ। पिता अरविन्द बोबडे मशहूर वकील थे, जो महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल रह चुके थे। इनके दिवगंत भाई विनोद अरविन्द बोबडे सुप्रीम कोर्ट के वकील थे। सीजेआई बोबडे की शुरूआती पढ़ाई लिखाई नागपुर में हुई। नागपुर के एस एफ एस कॉलेज से इन्होंने ग्रेजुएशन किया और उसके बाद नागपुर विश्वविघालय से कानून की पढ़ाई किये।

वकील से मुख्य न्यायाधीश तक का सफ़र
वकालत की पढ़ाई पूरी करके 1978 में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में अधिवक्ता के रूप में रजिस्ट्रेशन कराया और वकालत की शुरुआत हुई, शायद उस समय इन्हें भी पता नहीं होगा कि यह वकील से शुरु होने वाला सफ़र सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक का रास्ता तय करेगा। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में 21 साल तक न्याय दिलाने का सफ़र चलता रहा। समय आया वकील से न्यायाधीश का पद भार संभालने का मार्च,2000 में बॉम्बे हाईकोर्ट के अतिरिक्त जज के रूप में शपथ ली। उसके बाद 16 अक्तूबर 2012 को वह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 12 अप्रैल 2013 को उनकी पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में हुई। इतने पर भी ये सफर रुका नहीं इस सफर की मंजिल कहीं और ही थी। वह मंजिल थी भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश बनने का और तारीख तय थी 18 नवंबर 2019।

अपने कार्यकाल में कर चुके है कई अहम फैसला
2015 में आधार कार्ड के फैसले की सुनवाई जब तीन जजों की पीठ ने किया था, जिसमे यह कहा गया कि “भारत के किसी भी नागरिक को आधार कार्ड के अभाव में मूल सेवाओं और सरकारी सेवाओं से वंचित नहीं किया जा सकता”। इन तीन जजों की पीठ का हिस्सा रहे चीफ जस्टिस बोबडे।

चीफ जस्टिस रह चुके रंजन गोगोई पर एक महिलाकर्मी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। जस्टिस बोबडे ने तीन सदस्यीय हाउस जांच समिति की अध्यक्षता की थी। इस मामले में जस्टिस रंजन गोगोई को क्लीन चिट मिली। इस तीन सदस्यीय जाँच समिति में दो महिला जज जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस इंदु मल्होत्रा भी शामिल थीं।

इसके अलावा चीफ जस्टिस बोबडे ने 2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ जब जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस कुरियन जोसफ ,जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस मदन बी लोकुर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस किया तब इन चारो जजों के मतभेद सुलझाने जस्टिस बोबडे ने अहम् भूमिका निभाई थी।

सबसे अहम फैसला जस्टिस बोबडे ने डाउन सिंड्रोम से पीड़ित महिला की सुनवाई करते हुए उन्होंने उसकी गर्भपात की याचिका खारिज कर दी। बताया गया की भ्रूण 26 हफ़्ते का हो चुका था। डॉक्टर के मुताबिक जन्म के बाद बच्चे को जीने की संभावना थी। इसके साथ ही कई ,मामलों पर इनके द्वारा फैसला सुनाया जा चुका। सीजेआई के नियुक्ति के बाद उनका यह मुख्य लक्ष्य है कि सभी मुकदमों का न्याय सुनिश्चित करना है।