भारत के रत्न

THE LEGEND: सरलता और सादगी के मूरत थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद

ब्यूरो रिपोर्ट। आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति,भारत रत्न से सम्मनित डॉ.राजेन्द्र प्रसाद बहुत ही निर्मल व शांत स्वभाव वाले व्यक्ति थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। इनके आदर्श रहे महात्मा गांधी के ही पद चिन्हों पर ही ये भी चले थे। इन्होंने वर्ष 1931 में गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन और वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए थे, जिसके कारण इन्हें जेल भी जाना पड़ा था। राजेंद्र प्रसाद के जीवन की कुछ ऐसे रोचक किस्से हैं जिन्हें आज हम आपको बताएंगे। 

 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 में बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ। इनके पिताजी का नाम महादेव सहाय और इनकी माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। यह अपने भाई और बहनों में सबसे छोटे थे। उन्होंने कानून में मास्टर की डिग्री और डाक्टरेट की उपाधि हासिल की थी।राजेंद्र प्रसाद ने भारतीय संविधान के निर्माण में अपना खास योगदान दिया था। साल 1950 में राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बनाये गए। वे 12 साल तक राष्ट्रपति पद पर बने रहे। साल 1962 में राष्ट्रपति पद से हट जाने के बाद राजेंद्र प्रसाद को भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया।

राजेंद्र प्रसाद एक उच्‍च कोटि के लेखक भी थे उन्‍होंने 1946 में अपनी आत्मकथा के अलावा और भी कई पुस्तकें लिखी जिनमें बापू के कदमों में (1954), इंडिया डिवाइडेड (1946), सत्याग्रह ऐट चंपारण (1922), गांधी जी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र आदि कई रचनाएं शामिल हैं।जुलाई 1946 को जब संविधान सभा को भारत के संविधान के गठन की जिम्मेदारी सौंपी गयी तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया। आज़ादी के ढाई साल बाद 26 जनवरी 1950 को स्वतन्त्र भारत का संविधान लागू किया गया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चुना गया।

राष्ट्रपति के रूप में अपने अधिकारों का प्रयोग उन्होंने काफी सूझ-बूझ से किया और दूसरों के लिए एक नई मिसाल कायम की। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने मित्रता बढ़ाने के इरादे से कई देशों का दौरा किया और नए रिश्ते स्थापित करने की मांग की।अपने जीवन की अंतिम समय में पटना के सदाकत आश्रम में व्यतीत किया, जहां 28 फरवरी 1963 को ये हमेशा हमेशा के लिए चिर निंद्रा में लीन हो गए। आज भी देश उनके द्वारा किये गए कार्यों को याद करता है,साथ ही उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में उनको कोटि कोटि नमन करता है।

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