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विशेष रिपोर्ट : कैसे होगी गंगा की स्वच्छता? जब नहीं होंगे जानकार

 

वाराणसी। स्वच्छ गंगा व निर्मल गंगा के लिए मोदी सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर दिए,लेकिन धरातल पर गंगा का जल अभी भी काफी गंदा है। हाल ही में कई सारी रिपोर्ट्स ऐसी आयी जिससे यह बात स्पष्ट हो गया कि वाराणसी में आज भी गंगा का पानी आचमन योग्य नहीं है। यहां बात अगर गंगा के समस्या के निदान की करें तो यह जानकार ही बता सकेंगे,जिनकी अब देश में कमी है।

यह कमी होना लाजमी इस नजरिए से भी है कि रिवर रिसर्च को लेकर देश में पहली बार बीएचयू में सन 1985 में स्थापित किया गया गंगा प्रयोगशाला.. कई वर्षों से बंद होने के कारण अब इस विषय के जानकार व इंजीनियर निकलना बंद हो गए हैं। बदहाली का शिकार इस गंगा प्रयोगशाला पर ताला लटका हुआ है और अब इसके बारे में सोचने वाला भी कोई नहीं है।

बीएचयू के रिटायर्ड प्रोफेसर व गंगा वैज्ञानिक प्रोफेसर यू.के.चौधरी बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के समय सन 1980-83 में इस प्रयोगशाला की नींव पड़ी थी। इस प्रयोगशाला का उद्देश्य था कि गंगा की समस्या का निदान मॉडल द्वारा कैसे होगा?

इस प्रयोगशाला को बनाने के लिए 1600 ट्रक से गंगा की मिट्टी लाई गई और 60 हजार स्क्वायर फ़ीट का यहां गंगा का प्लेटफार्म बना। पूरे प्रयोगशाला का एरिया 80 हजार स्क्वायर फ़ीट है। यहां पर 30 किलोमीटर लेंथ को एक बार में मॉडलिंग किया जाता था।

रिवर मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी के लिए एम.टेक.के विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए बने इस प्रयोगशाला का मुख्य उद्देश्य गंगा की समस्या का निदान करना ही था। हर साल यहां एम.टेक.के 8 स्टूडेंट्स के लिए सीट थी,यहां से कई पीएचडी स्कॉलर भी हुए जिनमें से तीन की पीएचडी कम्प्लीट भी हुई।

2011 तक यह प्रयोगशाला चली,लेकिन उसके बाद कुछ समस्याओं के कारण या यह कहें कि जानकारों के अभाव में यह बन्द कर दी गई,जिसके कारण अब यह कहा जा सकता है कि नदियों की मूल समस्या के निदान करने वाले जानकर अब नहीं आएंगे। अब ऐसे में गंगा की स्वच्छता की बात धरातल पर कितना सही साबित होगी..इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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