वाराणसी

अयोध्या में घूमता समय का पहिया, 23 दिन के भीतर होगा निर्णय

अयोध्या। दशकों से चले आ रहे रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला आज आने वाला है। ऐसे में लोगों की धड़कने बढ़ती नजर आ रही हैं। इस फैसले का लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कि राम मंदिर और बाबरी मस्जिद पर कोर्ट का क्या फैसला आएगा। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है।

कैसे शुरू हुआ राममंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद आइए जानते हैं

सन 1528 में अयोध्या में एक ऐसे स्थान पर मुगल सम्राट बाबर ने बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया, जिसे हिन्दू भगवान राम की जन्म भूमि मानते रहें। पहली बार अयोध्या में 1853 में साम्प्रदाायिक दंगे हुए थे। हिंदुओं का आरोप था कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया गया था। इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई थी। इसके बाद 1859 में अंग्रेज शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी थी। परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिन्दुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी गई, जिससे लोगों में भाईचारे की उम्मीद जागी थी।

राम मंदिर को लेकर पहली बार 1885 में मंहत रघुबर दास ने फैजाबद की अदालत में याचिका दायर की थी, जिसमें ये मांग की गई थी कि बाबरी मस्जिद से सटे हिस्से में राम मंदिर का निर्माण कराया जाए। 1949 में 50 हिन्दूओं ने मिलकर भगवान राम की मूर्ति मस्जिद के मुख्य स्थान पर रख दी और रोज पूजा करने लगे। इसके बाद मुसलमानों ने वहां नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

सन 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर की। रामलला के पूजा अर्चना की इजाजत मांगी। साथ ही मस्जिद से मूर्ति हटाने पर न्यायिक रोक की मांग की। उसी साल महंत परमहंस ने रामचंद्र ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने व बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। इसके बाद यूपी के सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए 1961 में मुकदमा दायर किया।

सन 1984 में विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में राम मंदिर के निर्माण के लिए एक समिति का गठन किया गया औऱ 1986 में जिला मजिस्ट्रेट ने हिन्दुओं को पूजा करने हेतु विवादित मस्जिद का ताला खोल देने का आदेश दिया। इस पर मुसलमानों ने कोर्ट के आदेश का विरोध किया। इसके बाद मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति’ का गठन किया।

6 दिसम्बर सन् 1992 में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे और हजारों की संख्या में हिंदू संगठन ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था, जिसके बाद से इस मुद्दे पर राजनीति गरमा गई। तात्कालिक प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने मस्जिद का पुननिर्माण करने का वादा किया, तब जाकर दंगे शांत हुए।

सन् 2009 में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो उसमें बड़े-बड़े नेताओं के नाम सामने आए। बहुत से नेताओं को क्लिन चिट दे दी गई। 2010 की सुनवाई में नेताओं के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी, जिसे हाईकोर्ट में खारिज कर दिया गया। उसी साल जुलाई में सुनवाई के बाद फैसले की तारीख सुनिश्चित की गई, लेकिन फैसले पर रोक लगाने और बातचीत से मसले का हल निकालने की मांग को लेकर सेवानिवृत्त नौकरशाह रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने उच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की। तो उच्च न्यायालय ने रमेश चन्द्र त्रिपाठी की याचिका खारिज कर दी। साथ ही शीर्ष न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर लगी रोक को हटा लिया।

30 सितम्बर 2010 को उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाने का निर्णय लिया। इस दिन देश की जनता को राम मंदिर मुद्दे पर आने वाले फैसले का बेसब्री से इंतजार था। इसी दिन अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाइकोर्ट के लखनऊ खंडपीठ द्वारा इस ऐतिहासिक मामले पर फैसला आने वाला था। उच्च न्यायालय की तीन सदस्यी विशेष पीठ के न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए जमीन को तीन हिस्सों में बाटंने का फैसला किया। पहला हिस्सा जहां रामलला विराजमान है वो हिस्सा हिन्दुओं को दिया जाए। दूसरा हिस्सा अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए।

इस फैसले से जहां एक ओर हिन्दुओं में हर्ष उल्लास की लहर दौड़ उठी तो वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय में निराशा दिखाई पड़ी, लेकिन इन सब के बावजूद दोनों समुदायों द्वारा न्यायालय के फैसले को सम्मान दिया गया। हालांकि इस फैसले के बाद भी दोनों समुदायों को यह अधिकार प्राप्त था कि वह इस फैसले के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकते हैं। इसके बाद 2011 में हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा थी।

1 मार्च 2017 को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि अगर दोनों पक्षो राजी हो तो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता की जा सकती है। इसके बाद से 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर लगातार सुनवाई कर रही है। बुधवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि 1 नवंबर से 10 नवंबर के बीच फैसला राम मंदिर पर फैसला आ जाएगा। साथ ही किसी को कोई भी दलील पेश करनी है तो तीन दिन के अंदर वो लिखकर दे सकते है।

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