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दीए की रोशनी पड़ रही फीकी, झालरों की बढ़ रही डिमांड

रिपोर्ट- मोहम्मद अफजल

चन्दौली। दीपावली दीपों का पर्व है। दीपावली में मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन बदलते दौर में मिट्टी के दीपक की जगह अब चाइनीज झालरों ने ले ली है। जो सस्ता होने के साथ-साथ सुविधाजनक भी है। जनता मिट्टी के दीपकों को दरकिनार कर धड़ल्ले से चाइनीज झालरों का प्रयोग कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ महंगाई की मार झेल रहे कुम्हारों को लागत के अनुसार मुनाफा भी नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह से कुम्हार इस पुश्तैनी धंधे को बंद करने के कगार पर आ गए है। 

कुछ कुम्हार इस पुश्तैनी धंधे को जीवित रहने रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। कुम्हारों को दीपक बनाने के लिए न तो मिट्टी मिल रही है न ही सस्ते दामों पर दीपक पकाने के लिए कोयला मिल रहा है। दीपावली का त्योहार आते ही बाजारों में कलात्मक मूर्तियां दिखने लगती है, लेकिन उस कला को जिंदा रखने के लिए लोगों को कितनी परेशानियां उठानी पड़ती है।

सरकार के पास समाज के हर तबके के लिए कोई न कोई योजना है, लेकिन किसी सरकार ने कुम्हार के पुश्तैनी रोजगार को जीवित रखने के लिए मिट्टी कला जैसे उद्योग को बढ़ावा देना ठीक नहीं समझा। एक कुम्हार का कहना है कि रंग रोगन के दाम आसमान छू रहे हैं। विकास के दौर में विलुप्त होते तालाबों की वजह से महंगे दामों पर मिट्टी खरीदना पड़ रहा है।

बाजार में बिकते चाइनीज झालरों की वजह से कुम्हार को मेहनत का फल नहीं मिल पाता है। इस वजह से यह पारंपरिक कला ज्यादातर परिवारों से विलुप्त होती जा रही है। कुम्हार अपने पुश्तैनी धंधे को छोड़कर मेहनत मजदूरी करने निकल जा रहे है। हालांकि कुछ लोगों ने इस पारंपरिक कला को अभी भी जिंदा रखा है, लेकिन वे लोग भी महंगाई के दौर में धीरे-धीरे इस कला से मुक्त होना चाहते हैं।

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