वाराणसी

शिक्षा के लिए तरस रहे नौनिहालों को शिक्षित कर रहे काशी के ‘राधाकृष्णन’

वाराणसी। गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय..शिक्षक दिवस आज पूरे देश मेंमनाया जा रहा है । डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर घोषित ये दिवस शहर बनारस में कुछ खास होता है क्योंकि यहां का एक शिक्षक पिछले कई वर्षों से निःशुल्क ऐसे बच्चों को शिक्षा देता आ रहा है जो इसके हकदार तो हैं पर इससे काफी दूर हैं ।

बोट स्कूल हो या स्टेशन पर घूमते हुए बच्चे सभी की शिक्षा का ज़िम्मा इस अकेले कंधे पर है, जी हां हम बात कर रहे हैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ राजीव श्रीवास्तव की, इस शिक्षक दिवस पेश है काशी के बेसहारा बच्चों के शिक्षक डॉ राजीव श्रीवास्तव पर नेशनल विज़न की खास रिपोर्ट ।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर डा० राजीव श्रीवास्तव ने अपना जीवन शिक्षा के लिये समर्पित कर दिया। 1988 में कूड़ा बीनने वाले बच्चों को पढ़ाने की ऐसी लत लगी कि उन्होंने गरीब और बेसहारा बच्चों के लिये अपना घर छोड़ दिया। झुग्गी, दलित बस्ती और मुस्लिम बस्ती में घर-घर जाकर बेटियों को स्कूल भेजने के लिये प्रेरित किया। बेसहारा बच्चों को पढ़ाने के लिये गोद लिया और उनके रहने, खाने और पढ़ने की व्यवस्था की। किराये के मकान में रहते हुये भी उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के लिये साथ ही रखा। बच्चों की संख्या बढ़ी तो एलआईसी से कर्ज लेकर लमही के इन्द्रेश नगर में सुभाष भवन बनवाया। जहां हिन्दू मुस्लिम दलित सभी बच्चे एक साथ रहकर न सिर्फ शिक्षा ग्रहण करते हैं बल्कि एक रसोई में एक साथ भोजन भी करते हैं। शिक्षा के साथ राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता का भी पाठ पढ़ाते हैं। अब तक 783 बेसहारा बच्चों को शिक्षित कर उनका जीवन बदल चुके हैं। फिलहाल अभी 30 बच्चों को पढ़ने, लिखने, भोजन का प्रबंध कर रहे हैं। डा० राजीव श्रीवास्तव ने सरकार से किसी भी प्रकार की सहायता लेने से इंकार कर दिया। अपना पूरा वेतन बच्चों की शिक्षा, पालन पोषण, भोजन के लिये दान कर देते हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में डा० राजीव जब इतिहास की क्लास लेते हैं तो दूसरे विषयों के भी विद्यार्थी उनकी क्लास करने आते हैं। सभी विद्यार्थियों को डा० राजीव श्रीवास्तव के मध्यकालीन इतिहास की क्लास का इंतजार रहता है। अपने विद्यार्थियों से डा० राजीव हमेशा कहते हैं कि मैं 24 घंटे का शिक्षक हूँ। इसलिये कही भी कभी भी पढ़ा सकता हूँ। हॉस्टल में प्रतियोगिता की तैयारी करने वाले विद्यार्थी रात को भी गुरूजी से पूछना नहीं भूलते और डा० राजीव उसी तरह से उनका उत्तर भी देते हैं।

अपने जीवन को शिक्षा के लिये समर्पित करने वाले डा० राजीव श्रीवास्तव के मुरीद बीएचयू के छात्र हैं तभी तो बीएचयू के छात्रों ने कहा था “नेता दल बदलते हैं, डाक्टर दिल बदलते हैं और डा० राजीव सर जीवन बदलते हैं”। बीएचयू में पढ़ने आये कई विद्यार्थी उनके जीवन से प्रभावित होकर उनके साथ ही रहने लगे। डा० राजीव श्रीवास्तव के निर्देशन में शोध कर चुके चारों विद्यार्थी अब प्रोफेसर बन चुके हैं। बीएचयू से विभिन्न नौकरी में जाने वाले डा० राजीव के विद्यार्थी आज भी उनके सम्पर्क में रहते हैं और अपनी समस्या को उनसे बताते हैं। डा० राजीव की इतिहास की कक्षा इतनी लोकप्रिय है कि उनकी कक्षा में बलबन का इतिहास, मंगोलों का इतिहास और अलाउद्दीन खिल्जी का इतिहास पढ़ने वाले उसी कक्षा को याद करते हैं।

डा० राजीव श्रीवास्तव के लिये कोई भी बेसहारा बच्चा यदि शिक्षा प्राप्त करते में असक्षम है तो उसके लिये सारी व्यवस्था सुभाष भवन से की जाती है। डा० राजीव प्लेटफार्म स्कूल, स्कूल ऑन बोट, अक्षर स्कूल, स्कूल फॉर रैगपिकर्स आदि स्थापित कर चुके हैं। आज भी सुभाष भवन में निराश्रित बच्चों को पढ़ाने के लिये न सिर्फ समय निकालने हैं बल्कि उसको संस्कारवान बनाने के लिये प्रशिक्षित भी करते हैं। अभी हाल में ही राष्ट्र विद्या संस्कार शिविर लगाकर 28 बच्चों से मोबाइल की लत छुड़वा दी। हजारों बेटियों को स्कूल पहुंचा चुके हैं। डा० राजीव श्रीवास्तव के शोध छात्र धनंजय यादव बताते हैं कि गुरू जी का इतिहास की क्लास ऐतिहासिक होती थी। उनके क्लास में पढ़ने के बाद कभी किताब छूने की जरूरत नहीं पड़ी। सभी विद्यार्थियों से स्नेह के साथ मिलते थे। उन्होंने कभी भी किसी विद्यार्थी को परेशान नहीं किेया। कोई भी विद्यार्थी परेशानी में होता था तो उसकी मदद गुरूजी जरूर करते थे। एक आदर्श शिक्षक की तरह उनकी लोकप्रियता कायम है। गुरूजी अपने छात्रों के साथ उन बेसहारा और अनाथ बच्चों के लिये भी आदर्श शिक्षक है, जिनको पढ़ाने वाला कोई नहीं।

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